Wednesday, November 3, 2010

संस्मरण

थोड़ी सी जगह

प्रेम सागर सिंह

हर इंसान के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ होती है जो प्रायः उसे प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष रूप से अहर्निश प्रभावित करती रहती हैं । कहा जाता है कि जिंदगी की कुछ अहम बातें समय और उमर के साथ जुड़ी होती है और यदि उमर बीत जाए एवं वे बातें अनकही रह जाएं तो उन्‍हें फिर कभी नहीं कहना होता । लेकिन आज वे सारी बातें भावनात्‍मक ज्‍वालामुखी के रूप में स्‍वतः सामने आ गई । कल्‍पना ने टेलिफोन द्वारा सूचित किया कि उसकी नियुक्ति दिल्‍ली के किसी मंत्रालय में विधि सलाहकार के पद पर हो गई है एवं वह कल दिल्‍ली जा रही है । शाम को घर आते हे मुझे उससे मिलने की उत्‍कट इच्‍छा जाग्रत होने लगी । उसके यहाँ से चले जाने की बात ने अचानक मुझे अतीत की स्‍मृतियों के विवर में झाँकने पर मजबूर कर दिया । मुझे 22 वर्ष पूर्व सुरेन्‍द्र नाथ ला कॉलेजके वे दिन याद आने लगे जहाँ से हम दोनों ने साथ-साथ तीन वर्ष की पढ़ाई पूरी कर विधि-स्‍नातक की डिग्री हासिल की थी ।

उन दिनों मैं वायु सेना में सीनियर नान-कमीशन्‍ड आफिसर के पद पर कार्यरत था एवं प्रोमोशन तथा आगे पढ़ने की इच्‍छा के कारण यह पाठ्यक्रम चुना था । प्रवेश फार्म लेते समय अचानक मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी जो काउन्‍टर के पास खड़ी अन्‍य लोगों को अपलक नयनों से नीहार रही थी । उसकी भाव- भंगिमा एवं आँखें, लगता था कुछ कहना चाह रही हैं । फार्म लेने के बाद न जाने किन भावनाओं के वशीभूत होकर मेरे कदम अचानक उसकी ओर बढ़ गए थे । मैं आज तक इसे समझ नहीं पाया । पास पहुँचकर मैंने उससे पूछा क्‍या तुम फार्म नहीं लोगी?” इस पर उसकी आँखें नम हो गई थी एवं उन नम हुई आँखों में झांककर मैं जो कुछ पढ़ा, अनुभव किया, वह मुझे समझाने के लिए काफी था । कालेज कैम्‍पस में शोरगुल के कारण मैं उसे अति आग्रह के साथ बाहर लाया एवं एक चाय दुकान में बैठकर बातों का सिलसिला शुरू हुआ । दोनों ओर से परिचय का आदान-प्रदान हुआ एवं मैं यह जान पाया कि उसका नाम कल्‍पना है एवं बिहार की रहने वाली है । उसका स्‍वाभाव एवं बातचीत करने का ढंग प्रथम मुलाकात के दौरान ही मुझे इतना आत्‍मीय बना दिया जैसे कि हम दोनों वर्षों से एक दूसरे से परिचित हैं। उसने अपनी हालातों का वर्णन कुछ इस तरह से किया कि मैं भी उसके बारे में जानने के लिए जिज्ञासु हो उठा। उसने बताया कि उसके पिताजी टी.बी. के मरीज हैं। वे भी वायु सेना से बहुत पहले ही अवकाश प्राप्त कर पेंशनभोगी हैं। घर की आर्थिक स्थिति आपसी बँटवारा के कारण दयनीय हो गई है । पेंशन ही अब मात्र जीविका का सहारा है । मुझे बचपन से ही वकील बनने की तमन्‍ना थी किंतु खर्च का अनुमान एवं पैसे का इंतजाम संभव न होने के कारण मैं पूरी असमंजस की स्थिति में निर्णय नहीं ले पा रही हूँ ।

मैं उसकी बातों को सुनकर एकदम भावुक हो उठा । उसे मदद करने की बेचैनी की एक असहनीय वेदना मुझे प्रभावित करने लगी । मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुँचा कि इस दुनिया में कौन इसकी अंतहीन व्‍यथा को सुनेगा, कौन है जो इसके सुख-दुख में समभागी बनेगा । लाखों लोगों के अपने-अपने अरमान होते है क्‍या सब लोगों के अरमान पूरे होते हैं ? कितने लोग आगे बढ़कर ऐसे लोगों की मदद करते हैं? मैं सोचने लगा कि मनुष्‍य का मनुष्‍य के प्रति काम आ जाना ही सही संदर्भों में जिंदगी जीना होता है । अपने बारे में तो सभी सोचते हैं अपना भविष्‍य निर्माण करते हैं घर बसाते हैं, लेकिन इंसानियत यही कहती है कि यदि दूसरों के बारे में भी कुछ ऐसा ही सोचा जाए तो इंसानियत का अर्थ एक नए रूप में उभरकर सामने आता है

अचानक मैं कह बैठा-कल्‍पना, मैं विश्‍वास दिलाता हूँ कि हर रूप में तुम्‍हारी मदद करूँगा । सारे खर्च वहन करूँगा । तुम इसे अन्‍य रूप में न लेना । यदि तुम राजी हो जाओगी तो जिदंगी का परम सुख मुझे मिल जाएगा। यह सुनकर वह अवाक नजरों से, मुझे देखती रही । मैंने अनुभव किया कि उसके चेहरे पर आशा और विश्‍वास की हल्‍की रेखाएँ उभरने लगी थी । गंभीर मुद्रा से निकल कर एक हल्‍की मुस्‍कान के साथ उसने कहा-पिताजी से सारी बातें कहूँगी एवं यदि वे आज्ञा देते हैं तो मैं आपके प्रस्‍ताव को स्‍वीकार कर लूंगी । अगले दिन पुनः कॉलेज में मिलने का वादा कर हम अपने अपने घर चले आए थे । दूसरे दिन निर्धारित समय पर वह कॉलेज आ गई थी । मैं मुख्‍य द्वार पर बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था । आते ही उसनें मेरा हाथ अपनी हाथों में पकड़ कर उसी दुकान की तरफ ले गई जहाँ हम दोनों पहली बार मिले थे । कुछ नाश्‍ता पानी के बाद उसने कहा- पिताजी आपसे मिलना चाहते हैं । आप भी वायुसेना में कार्यरत हैं एवं वे भी इसी सेना में थे सो लगता है यह आकर्षण उन्‍हें कुछ हद तक आपके उपर विश्‍वास का कार्य कर रहा है।

इसके पूर्व कि कुछ कहूँ उसने कुछ भी सुनने से इंकार किया एवं अपने घर बेलघरिया चलने के लिए मुझे मजबुर कर दिया ।

घर पहुँचते ही मुझे ऐसा एहसास हुआ कि जो भी उसने कहा सब सच है । उसने मुझे एक कमरे में बैठाकर चाय पानी दिया एवं स्‍वयं दूसरे कमरे में चली गई जहाँ उसे पिताजी रोग-शैया पर पड़े जिंदगी के शेष दिन गिनती कर रहे थे । थोड़ी देर बाद वह आई एवं मुझे पिताजी के कमरे में लेकर गई । मैंने उनका चरण-स्‍पर्श किया एवं ज्‍योंहि कुर्सी पर बैठा तो देखा उनकी आँखों से आसूँ निकल रहे थे । मैं निर्णय नहीं कर पा रहा था कि ये खुशी के आँसू थे या दुख के । एक संक्षिप्‍त परिचय के बाद जब उन्‍हें ध्‍यान से देखा तो मेरे पैर तले की धरती खिसकती नजर आने लगी और मुझे याद आया कि ये तो जैसलमेरयूनिट के मास्‍टर वारंट आफिसर अशो‍क सिंह थे जिनके अधीन मैं एक जुनियर अधिकारी था । उन्‍होंने भी मुझे पहचान लिया एवं कहा- सर्जेंट प्रेम सागर सिंह, तुम आज भी बदले नहीं । मुझे गर्व है कि तुम पहले की तरही आज भी सक्रिय, सफल एवं कुशल इंसान हो। मुझे याद आया कि ये वही वांरट आफिसर थे जिन्‍होंने फील्‍ड एरिया से मेरी छुट्टी मुख्‍यालय तक दौड़ लगा कर कराई थी । मेरी माँ का निधन हो गया था एवं जैसलमेर (राजस्‍थान) जैसे संवेदनशील जगह पर तैनात रहने के कारण छुट्टी देना अधिकारियों के लिए आसान काम नहीं था। ज्‍यों-ज्‍यों श्राद्ध का दिन नजदीक आता गया मैं उदास होता चला गया एवं एक दिन अचानक उन्‍होंने मेरी छुट्टी काफी दिक्‍कतों के बाद मंजूर कराकर रेलवे वारंट एवं अन्‍य कागजात मेरे हाथों में सौंप कर कहा था सर्जेंट, नाऊ यू कैन प्रोसीड आन लीव। मरे खुशी का ठिकाना नहीं रहा-मैं उनका चरण स्‍पर्श करना चाहा तो उन्‍होंने कहा था कि एक सीनियर होने के नाते मैंने अपना कर्तव्‍य किया है कोई एहसान नहीं । आखिर, मैं भी तो मनुष्‍य हूँ एवं मनुष्‍य होकर एक दूसरे के सुख-दुख को समझना उसे सुलझाना ही सही मायने में इंसानियत की सच्‍ची तस्‍वीर होती है सो मैंने किया है । बातों का सिलसिला जारी रहा । उन्‍होंने मेरे बारे भी पूछा, परिवार, रिश्‍ते सभी चर्चा के विषय रहे । वायु सेना में साथ-साथ काम करना एवं स्‍वजातीय आकर्षण के कारण उन्‍होंने मेरे परामर्श को स्‍वीकार कर लिया । एक विश्‍वास एवं आत्‍मीय लहजे में उन्‍होंने कहा- प्रेम, कल्‍पना का भविष्‍य, मेरे अरमान, इज्‍जत सब तुम्‍हारे हाथों सौंप रहा हूँ । आज के इस युग में तुम्‍हारे जैसा इंसान मिलना संभव नहीं । तुम से मिलकर मुझे आज जो खुशी मिली है इसका इजहार करने के लिए मेरे पास कोई शब्‍द नहीं है । कुछ दिन तक तो घर में रिश्‍तेदारों का अपने जाने का क्रम जारी रहा किंतु आर्थिक स्थिति अच्‍छी नहीं हाने के कारण आज बहुत दिन हो गए अब काई आता जाता नहीं है । ऐसे समय में तुम्‍हारा आगमन मेरे लिए ईश्‍वरीय उपहार है । लगता है हमारा, तुम्‍हारा एवं कल्‍पना का जन्‍म-जन्‍मांतर का संबंध है । यह कहते हुए वे बहुत भावुक हो गए थे, कल्‍पना भी बगल में बैठी थी । मैं उन्‍हं आश्‍वासन देकर विदा लेने लगा तो उन्‍होंने कहा – “कल्‍पना को कल कॉलेज भेज दूँगा एवं जो भी संभव हो करना. भगवान तुम्‍हें सदा सुखी रखें ।

दूसरे दिन कल्‍पना निर्धारित समय पर कॉलेज पहुँच कर मेरा इंतजार कर रही थी । फार्म लेकर वहीं भरा गया एवं फीस वगैरह जमा करने के बाद मुझे काफी प्रसन्‍नता हुई । कल्‍पना का मुख-मंडल भी एक अप्रत्‍याशित खुशी से अत्‍यधिक कांतिमय हो गया था । इसके बाद पुस्‍तक सूची में दिए गए किताबों को खरीद कर उसे दे दिया । समय काफी हो चुका था । अतः हम अपने-अपने घर के लिए रवाना हो गए ।

सोमवार से प्रथम वर्ष का क्‍लास प्रारंभ हुआ । मैं और कल्‍पना एक ही साथ बैठते थे। वह बहुत ही तेजस्‍वी छात्रा निकली । कभी-कभी जो विषय प्रोफेसर साहब के समझाने पर भी मुझे समझ में नहीं आता था उसका स्पष्टीकरण वह बडी ही सहजता से मुझे समझा देती थी। कहा जाता है- समय और ज्वार-भाटा किसी का इंतजार नहीं करता। ठीक वैसा ही हुआ। समय के प्रवाह के साथ हम दोनों अच्छे नम्बरों से प्रथम,द्वितीय.एवं तृतीय वर्ष पास कर गए। अंतिम वर्ष के समाप्त होने के कुछ महीने पूर्व हमारी दूरियां,एक पवित्र रिश्ते की सुगंध एवं उसके पिताजी का मेरे ऊपर अटूट विश्वास की मजबूत नींव लगा कि धाराशायी हो जाएगी किंतु मन तो एक ही होता है.दस बीस तो होता नही। मै भी कुछ परेशान सा रहने लगा था।गहन चिंतन के बावजूद ऐसा महसूस हुआ कि हम दोनों अपनेअपने लक्ष्य से भटक रहे हैं। मेरी आत्मा भी मुझे कोसने लगी एवं मै खुद एक ऐसी स्थिति में पहुच गया था जहां से किसी भी व्यक्ति के लिए वापस लौटना एक सहज एवं स्वाभाविक प्रक्रिया से होकर गुजरने में ही संभव था। इधर कुछ महीनों से अनुभव कर रहा था कि वह तमाम सामाजिक वर्जनाओं को तोड देना चाहती थी। हम दोनों एक दूसरे के प्रति अत्यंत सम्मोहित होने लगे थे।एक दिन उसने अति साहस एवं विश्वास के साथ कहा- प्रेम,मै तीन वर्ष तक प्रतीक्षा करती रही कि तुम मेरे लिए जो कुछ भी किए हो उसके एवज में मुझसे कुछ आशा रखते होगे किंतु तुमने कभी भी ऐसा कुछ महसूस नही होने दिया लेकिन अब मै, सोचती हू कि तुम्हारे लिए अपने आप को समर्पित कर- एक बार ही सही, तमाम सामाजिक वर्जनाओँ को तोडकर, तम्हे एक अप्रत्याशित एवं अनिर्वचनीय सुख की पराकाष्ठा पर पहुंचाकर अपने आप को उऋणी कर लूं। इसका निर्णय अब तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है । मैं किसी भी दिशा में चलने के लिए राजी हूं।

इन सारी बातों को सुनकर मुझे ऐसा लगा था कि हजार बिच्छुओं ने मुझे एक साथ काट लिया हो। मेरा अन्तर्मन एक गहरी व्यथा से आंन्दोलित हो गया था।लगा था कि ऐसा कुछ करके मै अपने आप को बहुत ही छोटा महसूस करने लगूंगा। मैने प्रण किया कि जिस विश्वास के सहारे उसके पिताजी ने उसको मेरे ऊपर छोडा था एवं जिन पवित्र भावनाओं एवं इन्सानियत के मजबूत रिश्ते के वशीभूत होकर आज तक जो कुछ भी किया, उसे शर्मशार नही करुँगा।

अपने आप को इस अग्निपरीक्षा की प्रत्येक कसौटी पर रखने के बाद मेरी अभिव्यक्ति को एक सार्थक रुप मिला। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि मै किसी प्रिय वस्तु को जानबूझकर खो रहा हूं किंतु दूसरे ही पल पर संयम रखते हुए मैनं कहा था- कल्पना,आज तक तुम्हे मै उस रुप में कभी भी न देखा, न चाहा न कल्पना ही किया

है। मै तुम्हारी मंजिल नही था बल्कि तुम हमारी मंजिल थी- मै तुम्हारा भाग्य-विधाता नही था, तुम मेरी भाग्य विधाता रही हो एवं मेरी जीवन यात्रा का अंतिम पडाव तुम ही तो हो। तुम्हारी कल्पना साकार हो गयी यही मेरे जीवन का परमानंद है, मंजिल है, उद्देश्य है तुम्हारी हर खुशी में मेरी अपनी खुशी छिपी हुई है। इन बातों को सुनकर वह अवाक सी रह गई। शायद प्रेम शब्द की व्याख्या से अपरिचित होने के कारण उसने इसे एक सहज रूप में लिया था। उसे समझाया, कुछ सोचनें पर मजबूर किया एवं इस बात का एहसास दिलाया कि तुमने जो कुछ भी सोचा एवं चाहा यह मेरे जीवन की अनमोल धरोहर रहेगी। वह एकाएक लगा किसी निंद्रा से उठकर कहने लगी- आज के युग में तुम्हारे जैसे लोग विरले ही मिलते हैं एवं आज तुम मेरे मन मंदिर में अराध्य- देव की जगह बस गए हो। तुम सर्वदा पूजनीय रहोगे-यह मेरा वादा रहा। इसके बाद वह बोली-प्रेम, तुम थोडा इंतजार करो। मै दस मिनट आ रही हूं। थोडी देर के बाद एक छोटा सा पैकेट लिए वह वापस आ गयी और मुझे उस पैकेट को हाँथ में देते हुए मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में,बहुत देर तक पकडी रही और कहा-तुम्हे यह एक सौगात के रूप में दे रही हूं, अस्वीकार न करना। इसके बाद उस दिन से हम दोनों के परस्पर मिलते रहने की प्रक्रिया का भी अंत हो गया। बस में चढते समय उसके आंसू मुझे भी उसी तरह आंदोलित कर गए थे। घर आने के बाद उसकी हर बात याद आती रही - क्या खोया. क्या पाया सोचते- सोचते न जाने कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला । दूसरे दिन का सबेरा आज उतना मोहक नहीं लग रहा था। रोशनी के बाद भी लगता था कि इस सूर्य की रोशनी में बेनूर अंधेरा है ।

रोज की तरह आज भी आसमान में बादल छाए हुए थे । मन स्‍वस्‍थ एवं चिंताहीन रहता है तो प्रकृति का दृश्‍य एवं मौसम भी सुहावना लगता है । कल तक जो हवाएं एक सुखद एहसास, स्‍फूर्ति एवं नव-जीवन का संचार करती थी, आज वही बेदर्द हवाएं तन को कष्‍ट पहुंचा रही थी । न्‍यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते अचानक कई विचार एक साथ मन में आने लगे थे । कुछ हद तक दार्शनिक भाव से प्रभावित होने लगा था । सोचने लगा था कि जिंदगी के कई रंग होते है एवं हर रंग अलग-अलग महत्‍व रखते हैं जो भी अपने आप को जिस रूप एवं शैली में चाहा रंग लिया लेकिन अफसोस होता है कि इंद्रधनुष में समाहित सात रंगों में से कोई भी रंग न मुझे रंग पाया न कल्‍पना को ही । इस हसीन और रंगीन दुनिया में ही हम दोनों चाह कर भी बेरंग रह गए थे । आज कालका मेल से कल्‍पना दिल्‍ली जा रही थी । मैं नियत समय पर हावड़ा स्‍टेशन पहुंच गया था । कल्‍पना और उसके सगे-संबंधी सभी लोग पहुंच गए थे । निर्धारित समय पर गाड़ी प्‍लेटफार्म पर आ गई थी । सभी लोग सवार होने लगे थे । मै एक मूक दर्शक एवं वियोग की विषम वेदना से व्यथित कुछ कहने सुनने की स्थिति में नही था। कल्पना का सारा सामान ट्रेन के अंदर रखा जा चुका था। धीरे-धीरे मै भी कंपार्टमेंट के नजदीक आ गया। कल्पना ने आगे बढ कर मेरा चरण स्पर्श किया। मेरा भी मन एक सुखद एहसास की अनुभूति से पुलकित हो उठा। वियोग की इस घडी मे मेरी चिंतन शक्ति, संवेदना, अभिव्यक्ति सभी बेजान सी हो गयी थी। इंसान चाहे जैसा भी हो उसके अंतर्मन में एक कोमल भावुकता अपना स्थायी रूप सुरक्षित रखती है। उसकी अभिव्यक्तियां,मानसिक संवेदनाएं सभी भाव शून्य हो जाती हैं। मन अधीर हो जाता है।मैं भी शायद इन सभी कारकों का शिकार हो गया था।गाडी खुलने का समय हो गया था।मैं खिडकी के पास खडा अपने आप पर नियंत्रण बनाए रखा था किंतु वियोग की अंतिम बेला में जो काम शब्द नहीं कर पाते आँसू कर जाते हैं। ऐसा मेरे साथ भी हुआ एवं चाहकर भी मैं आँसुओँ के पारावार को रोक न सका। इसके पूर्व कि मैं उन अविरल प्रवाहित आँसूओँ को पोछने के लिए अपना रूमाल निकालता- कल्पना ने बडे ही आत्मीय भाव से अपने दोनों हाँथों से मेरी आँखों से बहते हुए आँसुओं को पोंछ डाला। गाडी़ धीरे- धीरे प्लेटफार्म छोडने लगी थी। मैं भी खिडकी को पकडे आगे बढ रहा था-अचानक कल्पना ने अपने दोनों हाथों से मेरा हाँथ पकडकर डबडबाई आखों से कहा था-प्रेम जब कभी दिल्ली आना, मुझसे जरूर मिलनामै आजीवन तुम्हारा इंतजार करूंगी और अपने दिल में थोडी सी जगह तुम्हरी स्मृर्ति के रूप में अहर्निश सुरक्षित रखूँगी। गाडी चली गयी एवं

एक अंतहीन व्यथा को मन में लिए मैं घऱ वापस आ गया था। सोते समय अचानक मेरी नजर कल्पना द्वारा दिए गए पैकेट पर पडी- जिज्ञासाभाव से खोला तो देखा कि उसमें एक बेहतरीन रूमाल, लव बर्डस तथा दो सुंदर गुलाब के फूल थे जो आज भी मूल रूप घर के शो केश में वैसे ही पडे़ है।

इक बार तुझे अक्ल ने चाहा था भुलाना.

सौ बार रब ने तेरी तस्बीर दिखा दी।

प्रेम सागर सिंह

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Tuesday, August 17, 2010

कविता तेरे रूप अनेक

कविता तेरे रूप अनेक

प्रेम सागर सिंह

मन में आए भावों एवं शब्दों के साथ,

लालित्य एवं गेयता जब आ जाती है,

तब कवि-मन प्रस्फुटित हो जाता है,

और लेखनी स्वत: बोल उठती है।

समस्त कारकों को अपने में समाहित

करने के बाद संपूर्ण भावों के

सामीप्य में आकर ये उदगार,

कविता का रूप बन जाते हैं।

प्रेस में छपने के बाद कविता

उस रूप में नही रह जाती है,

उसके भाव, शब्द एवं अभिव्यक्ति,

सभी समवेत स्वर में बोल उठते हैं।

व्याकरण के समस्त उपादान,

अपने-अपने स्थान को परिवर्तित कर,

कविता का चिर- संगी बन कर ,

उससे अटूट रिश्ता जोड़ लेते हैं।

ये तो कविता के भाव की बातें हैं

पढ़ने पढ़ाने और छपने की बातें हैं,

तभी यह कविता कई अनकहे भावों को,

अचानक ही विस्फोट करा कर

साहित्य-जगत में हलचल मचा देती है।

किसी के मुख-मंडल को पीताभ तो,

किसी को रक्ताभ करने के साथ-साथ ,

किसी को हरीतिमा प्रदान कर जाती है.

य़ह कविता।

दुख-दर्द एवं पीड़ा से व्यथित व्यक्ति के,

रूदन की जिंदगी से कुछ लमहे निकाल कर,

एक पल के लिए ही सही, कभी हंसाती है,

तो कभी हंसते हुए को रूला भी देती है,

यह कविता।

हर प्रेमी कवियों के अंतर्मन में ,

झांकती और बसती है, यह कविता,

सम्मेलन एवं कवि-गोष्ठियों में

हृदयस्पर्शी एवं मार्मिक बन जाती है,

यह कविता।

युवा पीढ़ी की धड़कन के साथ-साथ

उनके रंगीन सपने को बुनती है,

यह कविता।

जहां भी इसे प्रस्तुत किया जाता है

उस जगह को काव्यमय बनाती है,

यह कविता।

संयोग और वियोग के भावों को,

सजाकर प्रस्तुत करती है यह कविता,

हर स्तर के लोगों के आवाज को ,

मुखरित करती है यह कविता

समय के प्रवाह के साथ-साथ,

एक जगह पर स्थिर होने के बाद,

केदार नाथ सिंह सरीखे कवियों के

सामीप्य में आने के बाद स्वत: ही,

आलोचना के कठघरे में खड़ी होकर,

इसकी विषय-वस्तु बन जाती है,

यह कविता।

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Wednesday, July 28, 2010

कन्या रूपी रत्न

इस कविता में मां का अपनी बेटी के विवाह के समय उसकी मन:स्थिति का वर्णन तथा उसके प्रति उठती हुई भाव-तरंगों की प्रस्तुति है। हर मां के जीवन में इस मांगलिक अवसर पर मातृ-स्नेहिल प्रेम की शीतल बयार हिय के संवेदनशील तारों को निर्मम झकोरों से आंदोलित कर जाती हैं। कुछ ऐसे ही चिर-शाश्वत भाव-विंदुओं को अपनी पूर्ण समग्रता में समेटे विवाह-मंडप में वर को संबोधित मातृ-हृदय की अकथ पीड़ा-बोध का जीवंत-चित्रण प्रस्तुत करने का मेरा यह एक छोटा सा प्रयास है। यदि मेरा यह थोड़ा सा प्रयास आपके संवेदनशील हृदय को किंचितमात्र भी स्पंदित कर जाता है तो मुझे अनिर्वचनीय सुख की अनुभूति होगी एवं मेरी अभिव्यक्ति को सार्थक रूप मिलेगा।

कन्या रूपी रत्न

वह कन्या रूपी रत्न तुम्हे.

मैं आज समर्पित करती हूं ।

निज हृदय का प्यारा टुकड़ा,

तुमको मैं अर्पण करती हूं ।

मां की ममता का सागर है,

मेरी आंखों का तारा है,

कैसे समझाउं मैं तुमको,

किस लाड़-प्यार से पाला है ।

तुम मेरे दर पर आए हो,

मैं क्या सेवा कर सकती हूं ।

यह कन्या रूपी रत्न तुम्हे,

मैं आज समर्पित करती हूं ।

कर्तव्य-निष्ठा इस कन्या का,

हम सबका बहुत सहारा था ।

मैं अब तक जान न पाई थी,

इस पर अधिकार तुम्हारा था।

निज पलकों की घनी छांव में,

प्रतिपल ही बिछाए रखना।

हर खुशी इसे अर्पण करना

मनुहार, यही मैं करती हूं।

इससे तो भूल जरूर होगी,

यह सरला है सुकुमारी है।

इसके अपराध क्षमा करना,

यह मां की राजदुलारी है।

मम कुटिया की यह शोभा है,

दिल से मैं अर्पण करती हूं।

सातो जनम सुहागिन बनी रहे,

आशीष यही मैं देती हूं।

दोनों के प्रतीक्षित प्रेमांगन में,

प्रीति-पुष्प-लता चतुर्दिक फैले,

वैभव, सुख-शांति साथ रहे.

बस ,यही कामना करती हूं।

दिए हैं जो संस्कार इसे मैंने,

वह सर्वदा इसे निभाएगी।

विश्वास अटूट है मेरा इस पर,

नव-घर को सुखी बनाएगी।

इसके स्वप्नों के सृजनहार हो,

तुम्हारी अब यह अनमोल थाती है।

प्रतिपल ही प्रफुल्लित रखना इसे,

तुमसे करवद्ध हमारी विनती है।

हे धर्मपुत्र, हे वरश्री,

आशीष तुम्हे मै देती हूं ।

हर खुशियाँ सदा चरण चूमें,

वरदान यही मैं देती हूं ।

कलेजे पर पत्थर रखकर,

सहर्ष विदा मैं करती हूं।

यह कन्या रूपी रत्न तुम्हे,

मैं आज समर्पित करती हूं।

Friday, May 14, 2010

सबकी आशा: राजभाषा

सबकी आशा: राजभाषा

प्रेम सागर सिंह

भाषा अहर्निश प्रवाहित नदी के समान है। भाषा जो परिस्थिति, काल, समुदाय के अनुरूप ढ़लने लगती है, वही जीवंत भाषा है। हिंदी की वास्तविक प्रकृति में यह निहित है। अपनी लचीली और ग्राह्य प्रकृति के कारण यह सामाजिक आवश्यकताओं के बदलते परिप्रेक्ष्य में स्वयं को आसानी से परिवर्तित कर लेती है। स्वतंत्रता के दौरान विकसित भाषा के स्वरूप, शैली एवं प्रयोग में आज अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। बदलते युग संदर्भ की पृष्ठभूमि में आज यह संचार माध्यम की भाषा बनने के साथ- साथ विज्ञान जगत में भी अपनी सफलता दर्ज कराने में सफल सिद्ध हुई है। प्रवासी भारतीयों की बोली और आज के युवा पीढी़ की धड़कन की भाषा बन गई है। आज भारत में व्यापार के विविध क्षेत्रों में पदार्पण करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। सामाजीकरण एवं आर्थिक उदारीकरण के बदलते परिप्रेक्ष्य में आज हिंदी बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की भाषा बन गई है एवं शनै: शनै: इसे वैश्विक स्वीकृति भी मिल रही है।

सरकारी कामकाज के प्रत्येक क्षेत्र में राजभाषा हिंदी परिणामोन्मुखी दिशा में अग्रसरित हो रही है। इसे प्रत्येक स्तरों पर नई दशा और दिशा प्रदान करना हम सबका संवैधानिक दायित्व बनता है। सरकार की राजभाषा नीति, अधिनियम एवं विनियम के अनुपालन को सुदृढ़ करने के साथ- साथ इसके विस्तृत आयाम का सृजन ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। हमे अपनी मानसिकता, वैचारिक शक्ति एवं नैतिकता में बदलाव करना परम आवश्यक है। भाषा और संस्कृति हमारे देश की अस्मिता की पहचान हैं। इसके प्रति श्रद्धा. सम्मान, प्रतिबद्धता और इसके उत्तरोत्तर विकास में सहयोग करना हमारा नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है। हमे आशा ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि हम सब अपने-अपने स्तर पर राजभाषा हिंदी की श्रीवृद्दि के लिए सत्य-निष्ठा के साथ इसके चतुर्दिक विकास के लिए कटिबद्ध रहेगे।

यह मान लेना कि हिंदी सर्वरूपेण एवं सर्वभावेन एक सक्षम भाषा है, पर्याप्त नही है। इसे व्यवहारिक बनाना, अमल में लाना और राष्ट्र के मुख्य धारा में शामिल करना भी आवश्यक है। तदुपरांत, इसकी क्षमता का बोध सभी को होगा एवं उस स्थिति में विकास की हर यात्रा व पड़ाव में हमारी सहभागी बन सकेगी। ज्ञान- विज्ञान और सामयिक विषय जब हिंदी में लिखे जाएगे तब इसके प्रति विश्वास बढ़ेगा। इस दिशा में आवश्यकता है आत्म-मंथन की, संकल्प की जिसके माध्यम से शायद हमारा य़ह प्रयास पूर्वजों के मानसिक संकल्पनाओं को साकार करने में सहायक सिद्ध हो। यह शुरूआत तो हमें और आपको ही करनी है। आईए, इस पुनीत कार्य में सार्थक प्रयास की आधारशिला रखें ताकि सरकारी तंत्र, नियम और सरकारी कार्यालयों की कार्य-संहिता के साथ- साथ भारतीय बाजार, अर्थ व्यवस्था एवं सामासिक संस्कृति अपनी समग्रता में अक्षुण्ण बनी रहे।

Wednesday, April 21, 2010

अभिशप्त जिंदगी

अभिशप्त जिंदगी

प्रेम सागर सिंह

तुम्हारे सामीप्यबोध एवं

सौंदर्य- पान के वृत में

सतत परिक्रमा करते -करते

व्यर्थ कर दी मैने

न जाने कितनी उपलब्धियां।

तुमसे दुराव बनाए रखना

मेरा स्वांग ही था महज।

तुम वचनवद्ध होकर भी,

प्रवेश नही करोगी मेरे जीवन में,

फिर भी मैं चिर प्रतीक्षारत रहूं।

इस अप्रत्याशित अनुबंध में,

अंतर्निहित परिभाषित प्रेम की,

आशावादी मान्यताओं का

पुनर्जन्म कैसे होता चिरंजीवि।

जीवन की सर्वोत्तम कृतियों

एवं उपलब्धियों से,

चिर काल तक विमुख होकर

मात्र प्रेम परक संबंधों के लिए

केवल जीना भी

एक स्वांग ही तो है।

तुम ही कहो-

प्रणय -सूत्र में बंधने के बाद

इस सत्य से उन्मुक्त हो पाओगी

और सुनाओगी प्रियतम से कभी

इस अविस्मरणीय़ इतिवृत को

जिसका मूल अंश कभी-कभी,

कोंध उठता है, मन में ।

बहुत अप्रिय और आशावादी लगती हो

जब पश्चाताप में स्वीकार करती हो

कि अब असाधारण विलंब हो चुका है।

मेरी अपनी मान्यता है

उतना भी विलंब नही हुआ है

कि तमाम सामाजिक वर्जनाओं को त्याग कर,

हम जा न पाए किसी देवालय के द्वार पर

और

उस पवित्र परिसर को

अपवित्र करने के अपराध में,

हम जी न सकें,

एक अभिशप्त जिंदगी ही सही

मगर साथ- साथ------

Sunday, February 14, 2010

अमर रहे हम सब का प्यार

अमर रहे हम सब का प्यार

आज वैलेनटाइन डे के अवसर पर मैं उन समस्त प्रेमी,प्रेमिकाओं को स्वर्णिम भविष्य के निर्माण की आधारशिला का सृजन करने के लिए अंतर्मन से अपना अशेष आशीष देकर उनकी भावनाओं, कच्चे ,पक्के मन के प्रेम सरोवर में उठती नाना प्रकार की लघु उर्मियों को सही दिशा में स्थिर हो जाने के लिए ईश विनयी हूं।

आज के दिन को निर्णायक दिन के रूप में लें एवं प्रति वर्ष गत वर्ष में बटोरे, कहे अनकहे प्यार को स्पष्ट भावों एवं संवेदनाओं के माध्यम से एक दूसरे के साथ बांटने का प्रयास करें। हो सकता है आपका सही, निस्वार्थ और ईमानदारी से प्रस्तुत किया गया थोडा सा यह प्रयास आपके चिर प्रतीक्षित साथी को प्रणय सूत्र में बध जाने के लिए अभिप्रेरित कर दे। इस असंबोघित अभिव्यक्ति को मैं उन तमाम लोगो के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं जो आज के दिन को परंपरागत तरीके से मनाते आ रहे है।. दोस्तों !आज के दौर में प्रेम की परिभाषा बदल गयी है, अंदाज बदल गया है, शैली बदल गयी है, एवं बदल गया है लोगों का दिल जो परिवर्तन की तलाश में निरूद्देश्य एक विकल्प के लिए भागते रहता है।अंतत सुख की खोज में शांति और समय की खोज में जिंदगी के हसीन पल को खोते रहने की प्रक्रिया में स्वंय भी अस्तित्व विहीन हो जाता है।सुझाव है-प्रेम करो किंतु ऐसा प्रेम मत करो जिसके कारण अपने पराये बन जाए,सामाजिक मान्यता न मिलने के साथ-साथ दिल भी खुद गवाही न दे। यह चिर शावश्त सत्य है, अकाट्य है। आत्म मंथन करो, फिर इस पथ पर आगे बढो। भगवान आप सबको सही दिशा दे। मंगलमय कामनाओं के साथ ईश से मेरी विनती रहेगी कि आज का दिन समस्त सुधी प्रेमियों के लिए चिर स्मरणीय रहे।

Friday, February 12, 2010

अभाव के द्वार पर

अभाव के द्वार पर

प्रेम सागर सिंह

जब हम पहुंचते है अभाव के द्वार पर,

प्रेम की कमी खल ही जाती है,

और व्यथित हो जाता है मन ।

क्‍योंकि,

वह भाव जिसकी आस लिए,

हम पहुंचते हैं दर किसी के,

वहां से गायब सा हो जाता है ।

स्‍वागत की वर्षों पुरानी

तस्‍वीर आज बदल सी गई है ।

लोगों की संवेदनाओं के तार,

अहर्निश झंकृत होने के बजाए,

निरंतर टूटते और बिखरते जा रहे हैं ,

पहले बंद दरवाजे खुल जाते थे ,

आज खुले दरवाजे भी बंद हो जाते हैं ।

अभाव के द्वार पर प्रणय गीत,

मन को अब बेजान सा लगता है ।

गृहस्‍थ जीवन का भार ढो रहे,

संवेदनशील व्‍यक्ति के हृदय में भी,

प्रेम का वह भाव गोचर होता नहीं,

क्‍यों‍कि

वह स्‍वयं इतना बोझिल रहता है

कि, दूसरे बोझ को ढोने के लिए,

वह इस योग्‍य होता ही नहीं ।

चल रही शीतलहरी की एक अलसाइ शाम को,

जब हल्की धूप में तन्हा बैठा यादों के अतल में,

आहिस्ता-आहिस्ता जाने की कोशिश कर रहा था

कि अचानक भूली बिसरी स्मृतियों के झरोखे से

उस रूपसी की याद विचलित कर गयी थी मुझको ।

एक खूबसूरत अरमान को मन में सजाए,

फिर से एक बार उसे देखने की आश लिए,

पहुंच गया था उस सुंदरी के दर पर,

हाथ संकोच भाव से दस्तक के लिए बढ गया

बंद दरवाजा भी एक आवाज से खुल गया।

सोंचा मन ही मन,

खुशहाली से भरी जिंदगी होगी उसकी,

धन, धान्य और शांति से संपन्न होगी,

पर वैसा कुछ नजर नही आया,

जिसकी पहचान मेरी अन्वेषी आखों ने किया,

कहते हैं,

अभाव किसी परिचय का मुहताज नही होता,

शायद कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ,

नजदीक से देखा ,समझा ओर अनुभव किया,

लगा उसकी जिंदगी के सपने हैं टूटने के कगार पर

हालात को समझनें में देर न लगी

क्योंकि

मैं पहुंच गया था अभाव के द्वार पर,