Monday, January 16, 2012

हो जाते हैं क्यूं आर्द् नयन


 हो जाते हैं क्यूं आर्द्र नयन

                (प्रेम सागर सिंह)


हर इसान के जीवन में यादें ही हैं जो उसे कुछ सोचने समझने के लिए मजबूर कर जाती हैं। इस सत्य से कोई भी विमुख नही हो सकता। युवावस्था का प्रेम वियोग उम्र की इस दहलीज पर या ढलती वय में भी मुझे ही नही वल्कि सबको वीते वासर में लेकर चली जाती हैं एवं वहाँ पहुच कर मन को जो शांति मिलती है, वहव्लेंडर प्राईड या ब्लैक डॉग के पूरी बोतल को खाली कर देने के बाद भी नही मिलती है। जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही मेरा मन भी उन दिनों कुछ विचलित सा रहने लगा था किंतु विधि की विडंबना को टाला नही जा सकता । ऐसा कुछ मेरे साथ भी हुआ जिसे आज मैं महसूस करता हूं कि मैने जो सपने देखे थे, अपना बेशकीमती समय बर्बाद किया था, वह सोच कितनी गलत थी । यह बात जिगर है कि उन दिनों ऐसे कुछ भाव मन को कितने शुकून देते थे । उन विस्मृत पलों को याद करते हुए प्रस्तुत है मेरी कविता हो जाते हैं क्यूं आद्र नयन । अपनी कविता के साथ प्रस्तुत है, श्री दीपक पाटिल जी की एक कविता तेरी यादों का मौसम जो मेरा हाथ थामने के साथ-साथ एक अनिर्वचनीय सुख की अनुभूति से साक्षात्कार करा देती है। - प्रेम सागर सिंह

तेरी यादों का मौसम

(श्री दीपक पाटील)

आसमान के आंचल से इंद्रधनुष के रंग
तेरी तस्वीर में सिमट आते हैं,
धुआं-धुआं मौसम में बादल
तेरी यादों के बरस जाते हैं,
रेशम-सी हो जाती हैं शाम
हवा के झोंके जब तुझे गुनगुनाते हैं,
भीगे गुलमोहर के रंग
क्षितिज के कैनवास पर बिखर जाते हैं,
परिंदों के परों पर चढ़कर
कुछ सपने ऊंची उड़ान भरते हैं,
तेरी आवाज में कुछ शब्द
अपने लिए चुरा लाते हैं,
और पलकों की कोरों को
मोतियों से भर जाते हैं...!

हो जाते हैं क्यूं आर्द्र नयन

(प्रेम सागर सिंह)



हो जाते हैं  क्यूं आर्द्र  नयन,
मन क्यूं अधीर हो जाता है ।
स्वयं का अतीत लहर बनकर,
तेरी ओर बहा  ले जाता है ।                         
                 
                 
                     वे  दिन  भी बड़े  ही  स्नेहिल  थे.
                   जब प्रेम सरोवर स्वतः उफनाता था।
                   उसके  चिर  फेनिल उच्छवासों  से,
                 स्वप्निल मन भी  जरा सकुचाता था।     
                         

कुछ  कहकर   कुंठित   होता   था,
तुम  सुनकर  केवल  मुस्काती थी ।
हम  कितने  कोरे  थे   उस   पल,
जब कुछ बात समझ नहीं आती थी ।
  
 
     हम बिछुड़  गए दुर्भाग्य  रहा,
     विधि का भी शायद हाथ रहा ।
     लिखा भाग्य  में जो कुछ  था,
     हम  दोनों के  ही साथ  रहा ।

सपने तो  अब  आते ही नहीं,
फिर भी उसे हम बुनते रहे ।
जो पीर  दिया था अपनों  ने,
उसको ही सदा हम गुनते रहे ।


अंतर्मन में  समाहित रूप  तुम्हारा,
अचेतन मन को उकसाया करता है ।
लाख  भुलाने  पर  भी  वह  मन,
प्रतिपल  ही  लुभाया  करता  है ।



तुम जहां  भी  रहो  आबाद  रहो,
वैभव,  सुख-शांति   साथ  रहे  
पुनीत   हृदय   से   कहता  हूं ,
जग  की  खुशियां    पास  रहे ।   

 .....................................................................................            
                                           
                                               

                                   
                                      
 




39 comments:

  1. यादों को संजोने और उसे इस प्रकार अभिव्यक्त करना.. सचमुच मन को स्पर्श कर गयी यह रचना..

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    1. ankhon ke raste sidhe dil men utar janewali aur ghar kar lenewali rachnaen.

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    2. आपकी प्रतिक्रिया अच्छी लगी ।धन्यवाद ।

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    3. dono kavita bahut achchhi lagi, sukoon deti hui. aapko aur Deepak ji ko badhai.

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  2. आप दोनों की कविताएं बहुत अच्छी हैं।
    दीपक जी से परिचय कराने के लिए आभार।

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  3. यादों को बहुत सुन्दर कविता में संजोया है...
    सादर.

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  4. बहुत ही सुन्दर कविता..

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  5. vah prem ji bahut hi sundar pravishti hai .....bahut bahut abhar.

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  6. दोनों ही कवितायें दिल छू गयीं.

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  7. दोनों रचनाएं सुंदर।
    भावमयी प्रस्‍तुति।
    आभार...

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  8. भाव-भीनी यादें दिल को सुकून देती हैं.....
    शुभकामनाएँ!

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  9. सपने तो अब आते ही नहीं,
    फिर भी उसे हम बुनते रहे ।
    जो पीर दिया था अपनों ने,
    उसको ही सदा हम गुनते रहे ...

    बहुत खूब .. कभी कभी कुछ बातें बीते पल की याद बन जाती हैं ... और बहुत सताती भी हैं ... उदासी घेर लेती है अहिसे में ...

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  10. यादों को संजोती और प्रिय का हित दर्शाती भावुक सुंदर रचना!!!
    धन्यवाद!!!

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  11. bahut sundar ......achhi post aabhar ...

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  12. पढ़कर बहुत अच्छा लगा.

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  13. प्रेम भरी यादों में लिपटी हुई रचना ..

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  14. यादे हमेशा साथ रहती हैं। अच्‍छी कविता।

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  15. स्मृतियों के आँचल से बही सुन्दर कविता

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  16. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना!

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  17. दोनों कवितायें पुर -सुकून हैं .मन को सुकून देती हुई .यादों के समुन्दर बवंडर से आज भी उठतें हैं .क्योंकि यादें उनकी हैं जो हमारे न हुए ,ज़माने भर के हुए ,जिन्हें हम ता -उम्र हर तरफ देखा किये ऐसा ही होता है किशोरावस्था का प्यार ,सम्मोहन ,इन -फ़ेच्युएशन ,एक तरफ़ा ट्रेफिक सा ...बधाई सुन्दर लेखन के लिए भाव को बचाए रखने के लिए ...

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  18. Vah prem ji...... lajbab prastuti ...badhai.

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  19. बहुत सुंदर प्रस्तुति,बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई
    welcome to new post...वाह रे मंहगाई

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  20. वे दिन भी बड़े ही स्नेहिल थे.
    जब प्रेम सरोवर स्वतः उफनाता था।
    उसके चिर फेनिल उच्छवासों से,
    स्वप्निल मन भी जरा सकुचाता था।

    अरे वाह! प्रेम सरोवर जी.
    आपके अंदर प्रेम का सागर हिलोरे लेता है
    यह आपकी प्रस्तुति से जाना.

    सुन्दर भावभीनी प्रस्तुति के लिए आभार.

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  21. वाह बहुत ही खूबसूरत लिखा है आपने ...

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  22. दोनों कवितायें बहुत स्वाभाविक और सुन्दर हैं .अंतिम छंद की कामना मन को छू गई !

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  23. ये प्रेम रोग तो व्यक्ति को प्रेम सरोवर में डुबो देता है। सुंदर कविता के लिए बधाई॥

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    1. तुम जहां भी रहो आबाद रहो,
      वैभव, सुख-शांति साथ रहे ।
      पुनीत हृदय से कहता हूं ,
      जग की खुशियां पास रहे ।
      Kitnee sundar dua hai!
      Dono rachanayen aprateem hain!

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  24. बहोत अच्छे ।

    नया हिंदी ब्लॉग

    http://http://hindidunia.wordpress.com/

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  25. @हो जाते हैं क्यूं आर्द्र नयन,
    मन क्यूं अधीर हो जाता है ।
    स्वयं का अतीत लहर बनकर,
    तेरी ओर बहा ले जाता है ।

    बहुत सुंदर कविता!

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  26. बहुत सुन्दर !
    हमें आपकी कविता बहुत प्रभावित किया !
    आभार !

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  27. सुंदर कविता...... बधाई.....

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  28. दोनों की कविताएं बहुत अच्छी हैं।

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  29. दोनों कवितायेँ सुन्दर हैं!
    बधाई!

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  30. दोनों कविताये कमाल की है
    यादो का बहुत सुन्दत चित्रण
    अति उत्तम भाव रचना

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  31. बीते दिनों पर आज का वरदान या शुभकामनाएँ बरसाती ... ...

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