Wednesday, August 21, 2013

जो अपनी कारण सदा विवादों में घिरी रहीं

उम्र गुजर जाए, तो प्यार नही किया जा सकता !



 उम्र गुज़र जाए, तो क्या प्यार नहीं किया जाता ? - नसरीन

 

तसलीमा नसरीन ने एक बहुत ही उम्दा बात को सामने रखा था, कि " धर्म स्त्रियों की सदैव सेउपेक्षा करता रहा है " और इस बात को यहाँ लिखने के लिए मुझे कोई उद्धरण दिलासे के तौर पर सनद नहीं है। प्रभा खेतान जी के अनुसार पाश्चात्य "शरीरवादी" हैं, तथा ऐसे देशों में 'Gentleman, Ladies' ही उनके संबोधन होते हैं, जहाँ सुरक्षा तथा किसी प्रकार के रिश्ते के स्थापना मानस पटल पर फ़ौरन समाप्त कर दी जाती है। परन्तु भारत में अपरिचित स्त्री,पुरुषों के बीच, "भाई""बहन" आदि संबोधन का प्रयोग किया जाता है। इस संबोधन से सहयोग तथा भावनाओं  दोनों का तारतम्य एक साथ स्थापित किया जाता। इस तरह की प्रविष्टियों को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने की पष्ठभूनि में मेरा यह प्रयास रहता है कि हिंदी साहित्याकाश के दैदीप्यमान प्रकाशस्तंभों का सामीप्य-बोध हम सबको अहर्निश मिलता रहे एवं हम सब इन साहित्यकारों की अनमोल कृतियों एवं उनके जीवन दर्शन की घनी छांव में अपनी साहित्यिक ज्ञान-पिपासा में अभिवृद्धि करते रहें। आईए,एक नजर डालते हैं, बांग्ला देश की बहुचर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन पर, उनके जीवन एवं कृतियों पर जो हमें सत्य से विमुख न होने के साथ-साथ कभी बिखरने भी नही देती हैं। किसी भी साहित्यकार की रचना उसकी निजी जीवन की अनुभूतियों की ऊपज होती है । नसरीन के इन रचनाओं में कुछ खास ऐसी ही विशेषता है जिसे लोगों ने हाशिए पर रख कर उन्हे वो सम्मान और आदर नही दिया जिसका वे असल में हकदार थीं । मेरा प्रयास एव परिश्रम आप सबके दिल में थोड़ी सी जगह बना सकने में यदि सार्थक सिद्ध हुआ तो मैं यही समझूंगा कि मेरा प्रयास, संकलन एवं परिश्रम भी साहित्य-जगत के सही संदर्भों में सार्थक सिद्ध हुआ। - प्रेम सागर सिंह

 तसलीमा नसरीन का जन्म 25 अगस्त सन 1962 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह शहर में हुआ था। उन्होने मयमनसिंह मेडिकल कॉलेज से 1986 में चिकित्सा स्नातक की डिग्री प्राप्त  करने के बाद सरकारी डॉक्टर के रूप में कार्य आरम्भ किया एवं 1994 तक पूर्ण सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया ।विद्यार्थी जीवन से ही उनका लगाव साहित्य के प्रति बढ़ता गया एवं वे धीरे–धीरे साहित्य-सृजन की दुनिया में रचती बसती गई । जब वह स्कूल में थीं तभी से ही कविताएं लिखनाआरम्भ कर दिया था। तसलीमा नसरीन एक बांग्लादेशी लेखिका हैं जो नारीवाद से संबंधित विषयों पर अपनी प्रगतिशील विचारों के लिये चर्चित और विवादित रही हैं। बांग्लादेश में उनपर जारी “फतवे” की वजह से उन्हे कुछ दिन कोलकाता में निर्वासन की ज़िंदगी बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा । हालांकि कोलकाता में विरोध के बाद उन्हें कुछ समय के लिये दिल्ली और उसके बाद फिर स्वीडन में भी समय बिताना पड़ा है लेकिन इसके बाद जनवरी 2010 में वे भारत लौट आईं। उन्होंने भारत में स्थायी नागरिकता के लिये आवेदन किया है लेकिन भारत सरकार की ओर से उस पर अब तक शायद कोई निर्णय हो पाया है या नही मेरे संज्ञान में नही है स्त्री के स्वाभिमान और अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए तसलीमा नसरीन ने बहुत कुछ खोया। उनको अपने साहित्यिक सोच एवं विरोधी लोगों के साथ मुठबेड़ करना पड़ा । इस मुठभेड़ में कुछ टूटा, कुछ बिखरा । पर इन सब हालातों मे भी उन्होंने जिस अदम्य उत्साह एवं साहस का परिचय दिया, अपना भरा- पूरा परिवार, दाम्पत्य, नौकरी सब दांव पर लगा दिया। उसकी पराकाष्ठा थी देश निकाला । अपने जीवन को साहित्य के प्रति समर्पित करने वाली नसरीना को अपनी बातों को स्वतंत्र रूप से कहने के लिए जो सजा मिली य़ह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन ही है । यह बात जिगर है कि लोग इसे मानते हैं या नही। इस लेखिका के लिए मेरे मन में जो आदर है उसे प्रकट करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नही है । लेखक में इतनी शक्ति अवश्य होनी चाहिए कि अपनी रचना के लिए उसे किसी के सामने न झुकना पड़े । क्या सलमान रसदी के साथ भी जयपुर Literary Festival में जो कुछ भी हुआ उसे हमारी युगों पुरानी छवि धूमिल नही हुई है !  इतना कुछ होने के बाद हम सभी जानते हैं कि कालांतर में ये सारी बातें इतिहास बन जाएगी एवं इतिहास का पारंपरिक नियम यही कहता है कि उसे घटनाओं को तो दर्ज करना ही पड़ता है । आपके सामने प्रस्तुत है उनकी कृतियां जो हमें उनसे बरबस ही जोड़ देती है ।

उपन्यास : लज्जा, अपरपक्ष (उच्चारण : ओपोरपोक्ख) , निमंत्रण (उच्चारण : निमोन्त्रोन) , फेरा,द्विखण्डित (उच्चारण : द्विखंडितो) ,सेई सब अंधकार ( उच्चारण : सेई सोब अंधोकार) , अमी भालो नेई, तुमी भालो थेको प्रियो देश

 हिंदी में अनुदित उपन्यास : 1. औरत का कोई देश नही 2. औरत के हक में 3. एक पल साथ रहो 4. चार कन्या 5. उत्ताल हवा 6. छोटे-छोटे दु:ख 7. दुखियारी लड़की 8. निमंत्रण 8. फ्रांसीसी प्रेमी 9. बंदिनी 10.मुझे घर ले चलो 11. मुझे मुक्ति दो 12. मेरे बचपन के दिन 13. लज्जा 14. वे अंधेरे 
  
 प्रस्तुत है उनकी एक कविता : --------------

उम्र गुज़र जाए,तो क्या प्यार नहीं किया जाता?

तुम सिर्फ़ तीस के लगते हो, वैसे तुम हो तिरसठ के ! बहरहाल, तिरसठ के हो या तीस के, किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है ? तुम, तुम हो; तुम जैसे; ठीक वैसे, जैसा तुम्हें फबता है।  

जब-जब झाँकती हूँ, तुम्हारी युगल आँखों में लगता है, पहचानती हूँ उन आँखों को दो हज़ार वर्षों से ! होठ या चिबुक, हाथ या उँगलियाँ, जिस पर भी पड़ती है निगाह, लगता है पहचानती हूँ इन्हें।  

दो हज़ार क्यों, इससे भी काफ़ी पहले से पहचान है मेरी, इतनी गहरी है पहचान कि लगता है, जब चाहूँ छू सकती हूँ उन्हें, किसी भी वक़्त,  

रात या दोपहर, यहाँ तक कि आधी-आधी रात को भी ! यह भी लगता है जैसे चाहूँ, उनमें पुलक जगा सकती हूँ, रात जगा सकती हूँ,  

चिमटी काट सकती हूँ, चूम सकती हूँ, मानो वे सब मेरे कुछ लगते हैं। तीस-तीस साल के लगनेवाले मेरे अहसासों की तरफ तुमने, देखा है कई-कई बार, लेकिन कुछ कहा नहीं ! हर कोई किसी को भी ! लेकिन मुझे तो तुम्हारे कुछ कहने का इन्तज़ार था,
लेकिन कुछ नहीं कहा तुमने, मैं परखती रही, शायद मन ही मन कुछ कहो, लेकिन नहीं, तुमने कुछ भी नहीं कहा ! क्यों ? उम्र गुज़र जाए, तो क्या प्यार नहीं किया जाता ?

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Saturday, July 6, 2013

अतीत से वर्तमान तक का सफर

अतीत से वर्तमान तक का सफर

                                       
                                    प्रस्तुतकर्ता :प्रेम सागर सिंह    
    
मैं मानता हूं कि समय के साथ अतीत को भुलाकर लोग आगे बढ सकते हैं लेकिन जीवन में सब कुछ भुलाया नहीं जा सकता। कुछ लमहे, कुछ अवसर ऐसे होते हैं, जिनके साथ हम हमेशा जीना चाहते हैं। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसे लमहे एवं कुछ अवसर आएं हैं, जिन्हे मैं आज तक कभी भी नहीं भुला पया। बात सन 1984 की है। जब मैं सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज में “विधि स्नातक” के कोर्स में दाखिला लिया था। दाखिला मिलने के बाद मैं अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों से यह कहते हुए अपने आपको बड़ा ही गर्वित महसूस करता था कि बाबू राजेंद्र प्रसाद (भूतपूर्व राष्ट्रपति) भी इसी कालेज से ला (LL.B) की परीक्षा पास किए थे। उन दिनों मैं “भारतीय वायु सेना” में कार्यरत था। एक तो फौज की नौकरी और ऊपर से पढ़ाई का बोझ मुझे नीरस करता गया। मैं अपने रिश्तेदारों एवं फौजी भाईयों के बीच चर्चा का विषय बनता गया और इस चर्चा, कटाक्ष एवं उपहास ने मुझे कितना एकाग्रचित और गंभीर बना दिया था। इसे आज मैं उम्र की इस दहलीज पर पहुंच कर सोचता हूं तो मन सिहर सा जाता है। उन दिनों की यादें जीवन के हर एक पल में आज भी उसी तरह रची बसी हैं, जैसे पहले थीं। देखते-देखते समय कब गुजर गया पता ही नही चला। मैं भारतीय वायु सेना से रिटायर्ड होकर कोलकाता चला आया। यहां हमारा पुस्तैनी मकान है जिसमे हम चार भाई उस समय साथ ही रहते थे एवं उनमें से मै सबसे छोटा था।
विधि की विडंबना भी अजीब होती है। मेरे सामने अब तीन बच्चों का भविष्य नजर आने लगा। कोलकाता जैसे महानगर में 15 साल बाद आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा। मेरे कल्पना के अनुरूप परिस्थितियां विपरीत निकली। दोस्त, सगे संबंधी सब बदले-बदले से नजर आने लगे। लेकिन मैं हतोत्साहित नही हुआ एवं कुछ कर गुजरने का भाव मन में अहर्निश कौंधने लगा। इस विचार ने मुझे समुद्र में खोए हुए नाविक की भांति किनारे की तलाश के लिए बेचैन कर दिया। लोवर कोर्ट ,बैंकशाल कोर्ट एवं हाई कोर्ट तक का सफर एक वकील के रूप में करीब चार वर्ष तक तय करता रहा लेकिन जैसा चाहा था वैसा नही हुआ। एक बार मुझे महसूस हुआ कि मेरा शोषण किया जा रहा है लेकिन इस बात को मैंने किसी से भी शेयर नही किया। मैंने अनुभव किया कि इस पेशे में आने में बहुत देर हो गयी है। मेरी हालत सांप और छुछूदंदर जैसी हो गयी थी।
निराशा और अवसाद के इन दिनों में मैं अधीर सा हो गया था। मन ही मन इस पेशे से अलग होकर किसी दूसरे काम की तलाश करने लगा। कहते है – “भाग्य भी बहादुर इंसान का साथ देता है।“ वही मेरे साथ भी हुआ। इंसपेक्टर ऑफ इनकम टैक्स से लेकर, एयर इंडिया एवं इंडियन एयरलाइंस की लिखित एवं मौखिक परीक्षाएं भी पास करते गया। लेकिन विधाता ने इन नौकरियों को शायद मेरे भाग्य में नही लिखा था। कहते हैं- “भाग्य में जो लिखा होता है,वही मिलता है।“ मुझे भी विधाता ने वही दिया जो मेरे भाग्य में लिखा था यानि कोलकाता स्थित भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में (आयुध निर्माणी बोर्ड,कोलकाता) हिंदी अनुवादक का पद, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर इस ढलती वय में प्रभु के आशीर्वाद के रूप में ग्रहण किया। यहां से मैंने अपने जीवन को नए सिरे से जीना शुरू किया लेकिन यह सोचकर मन कभी-कभी संत्रस्त हो जाता है कि यह सफर 31 मार्च, 2015 को शेष हो जाएगा। इतना कुछ सोचने के बाद भी आशान्वित रहता हूं कि मेरी कुंडली में तीसरी सरकरी नौकरी लिखा है। काश! ऐसा संभव हो पाता।
बाबूघाट वाले ऑफिस से घर लोटते वक्त जब भी बस से सियालदह स्टेशन पार करता हूं, मेरी यादें मुझे बहुत पीछे की ओर खींच ले जाती हैं क्योंकि दाएं स्टेशन एवं बाएं मेरा “सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज” दिखता है। यहां पहुचते ही मेरा मन न जाने क्यूं उस अतीत से अनायास ही जुड़ जाता है जो कभी मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहा है । उन दिनों मै बहुत खोया लेकिन उससे अधिक पाया भी। कॉलेज के उन दिनों में मैं अपने दोस्तों के साथ-साथ निकटवर्ती बाजारों में कभी–कभी घूमने जाया करता था। शायद गर्मियों का दिन रहता था एवं कुछेक को स्टेशन तक भी छोड़ने जाता था।
 सियालदह ओवरब्रिज पर ट्राफिक जाम के कारण जब आस-पास नजर दौड़ाता था तो गुजरे 28 वर्षों पूर्व का दृश्य आँखों के सामने बरबस ही खींचा चला आता है। अठाईस वर्षों के बाद गर्मियों की इस शाम की शुरूआत में अपने शहर के पुराने चेहरे को याद करता हूं तो उसकी डूबती डबडबाती निगाहें सामने याद आती हैं । इन वर्षों में यह शहर भी बदला है। मैं भी बदला हूं एवं .शायद हम सबके रिश्ते भी बदल गए हैं।  इन बदलते परिस्थितियों में जब अपने आपको बीते वासर में ले जाता हू तो ऐसा लगता है कि बीते वर्षों में मेरे बचपन के परिचित इलाकों के मकान टूटे हैं, पेड़ नष्ट हुए हैं, गलियां गायब हुई हैं, वे लोग नही रहे है, जीवन शैलियां नही रही है। न जाने उस दिन क्या हो गया था पता ही नही चला। तमाम कोशिशों के बावजूद भी अतीत की यादें पूर सफर के दौरान मेरा पीछा करती ऱही। कभी अतीत में खो जाता था तो कभी शहर की जिंदगी से जुड़ जाता था तो कभी सामाजिक राजनीतिक विषय मन में कौंधने लगते थे।
मैंने अनुभव किया कि किसी के भी जीवन में फिर कभी किसी शहर का ही जीवन क्यों न हो अठाईस बरस कम नही होते हैं। पर अब भी इस शहर में ऐसे कितने ही इलाकों में ऐसा कितना ही कुछ बचा है, जो मुझे मेरे बचपन के शहर का ही लगता है। जिससे मैं अपने शहर को भी महसूस करता हूं और अपने बचपन को भी। इस ओवरब्रिज से देखने पर सियालदह स्टेशन या निकटवर्ती बाजार का नजारा भी तो बदला है। क्या यह स्टेशन और बाजार उतना ही पुराना नही है ! कुछ बदलाओं को छोड़ कर। इन विगत वर्षों में देह ही नही शहर की आत्मा भी बदला है। सोचता हूं, ये सब साथ-साथ ही बदलते होंगे।पुरानी गलियां नही रही और उनसे गुजरते हुए, उसमें बतियाते हुए लोग नही रहे। घर या किसी क्लब के करीब के चबूतरों पर बतियाते या खेलते हुए बूढ़े और बच्चे कम नजर आते हैं। लोगों की व्यवस्थाओं का स्वरूप भी बदला है, उनकी जीवन शैलियां और दृष्टियां भी बदली हैं। भोजपुरियन लोगों की भाषा में भी बदलाव आया है।  अब मेरे पड़ोस के बिहारी लोगों के अधिकांश घरों में लोग भोजपुरी की जगह खड़ी हिंदी का प्रयोग करते हैं। उनके बच्चे भी भोजपुरी भाषा भूलते जा रहे हैं। सोचता हूं, इसमें उन मासूम बच्चों का क्या दोष है! कभी-कभी यह भी लगता है कि पिछले अठाईस वर्षों में समाज की जगह सिकुड़ी है,व्यक्ति की जगह फैली है पर यह फासला वैसा फासला नही है जिसकी मानवीय आकांक्षाओं को कभी गढ़ा गया था। पुरानी पीढ़ी के बीच ये फासले और भी कम हुए हैं। बूढ़ों और बच्चों के बीच का पुराना संवाद, संबंध और सदभाव भी कम हुआ है। अन्यान्य कारणों से लोग अब अपना जितना समय सचमुच में परिवार के बीच बिताते हैं, बिताना चाहते हैं, उसमें गिरावट आई है। लगता है कि आदमी का अपने से भी संबंध कम होता गया है।    
 इसके बाद मेरी चिंतन धारा को एक नया आयाम मिला। अपने बारे में, अपने परिवार के संबंध में जब सोचने लगा तब मन बड़ा ही विकल हो उठा एवं आंखे नम होने लगी। बड़े भैया का निधन (2009) उसके करीब एक साल बाद (2010) मां जैसा प्यार और दुलार तथा वटवृक्ष की तरह शीतल छाया प्रदान करने वाली बड़ी भाभी का गुजर जाना एवं (2011)  में मझले भाई की अप्रत्याशित निधन के कारण मेरे अपने घर की ही धारणा और प्रभा भी बिखरती गयी है। मेरे घर के साथ-साथ पुराने घरों में व्याप्त सक्रियताएं, पारस्परिक संवाद और लगावों में भी बहुत कमी आई है। घर की अपनी जगह भी सिकुड़ती जा रही है। घर का अपना आत्म भी आहत हुआ है। क्या यह संभव हो सकता है कि आहत आत्म के घर में बसे हुए आदमी की अपनी आत्मा साबूत, स्थित और तनावहीन बनी रहे। लेकिन मेरे बचपन की बस्ती में पास-पड़ोस में मनुष्य की जितनी आवाजें सुनाई पड़ती थी अब उतनी नही । उन दिनों में एक आदमी दूसरे आदमी की, एक घर दूसरे घर की, एक परिवार दूसरे परिवार की चिंताओं और व्यथाओं से कम से कम निम्न मध्यवर्गीय इलाकों में तो जुड़ा हुआ रहता ही था। इन दिनों टेलिविजन और इंटरनेट नही हुआ करते थे। इनमें से टेलिविजन ने एक किस्म के लगाव को जन्म दिया है तो एक प्रकार के अलगाव को भी।
राग और विराग भले ही विपरीत दिशाओं में रहें पर शायद चलते साथ-साथ हैं। अपनी निगाहों से घरों, परिवारों में बढी हुई संवादहीनता को देखता हूं तब यह भी ख्याल आता है कि इस संवादहीनता के चलते या इसके कारण भी मानवीय सक्रियता का अभाव बढ़ता गया है। प्रतिरोध की राजनीति प्रभावित हुई है। परिवर्तन की आवाज सर्वत्र गुंजरित होने लगी है। सहयोग, मानवीय संवेदनाओं एव पीड़ा में निरंतर ह्वास देखने को मिल रहा है। सहयोग के धर्म का स्खलन हुआ है। मैं सोचता हूं कि संवाद, सहयोग और सक्रियता के भी अपने अंतर्संबंध होते होंगे। ये तीनों जब अपना संतुलन बना पाते होंगे तब समाज में सुख का जन्म होता होगा, शांति के दिनों में इतना विचारणीय और विवेकशील बना हुआ था, वही समाज इन तनावपूर्ण और हिंसक दिनों में कैसे इतना विचारहीन हो जाता है ।
इन्ही विचारों में डूबता उतराता रहा एवं बस कंडक्टर की कर्कश आवाज ने मुझे अचंभित कर दिया। इसके आगे मैं कुछ सोच पाता, उसकी आवाज इस बार काफी तेज थी। उसने बांगला भाषा में कहा –ओ, दादा कोताय नामबेन ( ओ भाई, कहां उतरिएगा)। बाहर झांक कर देखा तो मेरा बस स्टॉपेज आने वाला था। स्टॉपेज आने पर मैं बस से उतर तो गया लेकिन ऐसा लग रहा था कि बस के भीतर बैठे सभी यात्रियों की निगाहें मेरी ओर ही थी। पैदल चलते-चलते मन ही मन यही सोचता रहा कि अपने अतीत को, बीते दिनों के संघर्ष को कभी भुलाना नहीं चाहिए, लेकिन उसमें इतना भी नहीं खोना चाहिए कि वे यादें भविष्य के लिए बेडियों का काम करने लगें। भावनात्मक जुडाव तो होता है, लेकिन उससे निकलकर आगे भी तो बढना है। अतीत से जुडाव तो हमेशा ही रहता है, क्योंकि यह एक पेड की तरह है, जिसकी जडें हमेशा जमीन के अंदर होती हैं और जडें गहरी हैं- तभी पेड जिंदा है। अगर जडें ही मिट गई तो उसका अस्तित्व मिट जाता है। अब मैं अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गया हूं, जहां हर चीज अपनी पूर्णावस्था में परिलक्षित होती है।

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