Saturday, July 6, 2013

अतीत से वर्तमान तक का सफर

अतीत से वर्तमान तक का सफर

                                       
                                    प्रस्तुतकर्ता :प्रेम सागर सिंह    
    
मैं मानता हूं कि समय के साथ अतीत को भुलाकर लोग आगे बढ सकते हैं लेकिन जीवन में सब कुछ भुलाया नहीं जा सकता। कुछ लमहे, कुछ अवसर ऐसे होते हैं, जिनके साथ हम हमेशा जीना चाहते हैं। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसे लमहे एवं कुछ अवसर आएं हैं, जिन्हे मैं आज तक कभी भी नहीं भुला पया बात सन 1984 की है। जब मैं सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज में विधि स्नातक के कोर्स में दाखिला लिया था। दाखिला मिलने के बाद मैं अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों से यह कहते हुए अपने आपको बड़ा ही गर्वित महसूस करता था कि बाबू राजेंद्र प्रसाद (भूतपूर्व राष्ट्रपति) भी इसी कालेज से ला (LL.B) की परीक्षा पास किए थे। उन दिनों मैं भारतीय वायु सेना में कार्यरत था। एक तो फौज की नौकरी और ऊपर से पढ़ाई का बोझ मुझे नीरस करता गया। मैं अपने रिश्तेदारों एवं फौजी भाईयों के बीच चर्चा का विषय बनता गया और इस चर्चा, कटाक्ष एवं उपहास ने मुझे कितना एकाग्रचित और गंभीर बना दिया था। इसे आज मैं उम्र की इस दहलीज पर पहुंच कर सोचता हूं तो मन सिहर सा जाता है। उन दिनों की यादें जीवन के हर एक पल में आज भी उसी तरह रची बसी हैं, जैसे पहले थीं। देखते-देखते समय कब गुजर गया पता ही नही चला। मैं भारतीय वायु सेना से रिटायर्ड होकर कोलकाता चला आया। यहां हमारा पुस्तैनी मकान है जिसमे हम चार भाई उस समय साथ ही रहते थे एवं उनमें से मै सबसे छोटा था।
विधि की विडंबना भी अजीब होती है। मेरे सामने अब तीन बच्चों का भविष्य नजर आने लगा। कोलकाता जैसे महानगर में 15 साल बाद आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा। मेरे कल्पना के अनुरूप परिस्थितियां विपरीत निकली। दोस्त, सगे संबंधी सब बदले-बदले से नजर आने लगे। लेकिन मैं हतोत्साहित नही हुआ एवं कुछ कर गुजरने का भाव मन में अहर्निश कौंधने लगा। इस विचार ने मुझे समुद्र में खोए हुए नाविक की भांति किनारे की तलाश के लिए बेचैन कर दिया। लोवर कोर्ट ,बैंकशाल कोर्ट एवं हाई कोर्ट तक का सफर एक वकील के रूप में करीब चार वर्ष तक तय करता रहा लेकिन जैसा चाहा था वैसा नही हुआ। एक बार मुझे महसूस हुआ कि मेरा शोषण किया जा रहा है लेकिन इस बात को मैंने किसी से भी शेयर नही किया। मैंने अनुभव किया कि इस पेशे में आने में बहुत देर हो गयी है। मेरी हालत सांप और छुछूदंदर जैसी हो गयी थी।
निराशा और अवसाद के इन दिनों में मैं अधीर सा हो गया था। मन ही मन इस पेशे से अलग होकर किसी दूसरे काम की तलाश करने लगा। कहते है  भाग्य भी बहादुर इंसान का साथ देता है। वही मेरे साथ भी हुआ। इंसपेक्टर ऑफ इनकम टैक्स से लेकर, एयर इंडिया एवं इंडियन एयरलाइंस की लिखित एवं मौखिक परीक्षाएं भी पास करते गया। लेकिन विधाता ने इन नौकरियों को शायद मेरे भाग्य में नही लिखा था। कहते हैं- भाग्य में जो लिखा होता है,वही मिलता है।“ मुझे भी विधाता ने वही दिया जो मेरे भाग्य में लिखा था यानि कोलकाता स्थित भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में (आयुध निर्माणी बोर्ड,कोलकाता) हिंदी अनुवादक का पद, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर इस ढलती वय में प्रभु के आशीर्वाद के रूप में ग्रहण किया। यहां से मैंने अपने जीवन को नए सिरे से जीना शुरू किया लेकिन यह सोचकर मन कभी-कभी संत्रस्त हो जाता है कि यह सफर 31 मार्च, 2015 को शेष हो जाएगा। इतना कुछ सोचने के बाद भी आशान्वित रहता हूं कि मेरी कुंडली में तीसरी सरकरी नौकरी लिखा है। काशऐसा संभव हो पाता।
बाबूघाट वाले ऑफिस से घर लोटते वक्त जब भी बस से सियालदह स्टेशन पार करता हूं, मेरी यादें मुझे बहुत पीछे की ओर खींच ले जाती हैं क्योंकि दाएं स्टेशन एवं बाएं मेरा सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज दिखता है। यहां पहुचते ही मेरा मन न जाने क्यूं उस अतीत से अनायास ही जुड़ जाता है जो कभी मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहा है । उन दिनों मै बहुत खोया लेकिन उससे अधिक पाया भी। कॉलेज के उन दिनों में मैं अपने दोस्तों के साथ-साथ निकटवर्ती बाजारों में कभीकभी घूमने जाया करता था। शायद गर्मियों का दिन रहता था एवं कुछेक को स्टेशन तक भी छोड़ने जाता था।
 सियालदह ओवरब्रिज पर ट्राफिक जाम के कारण जब आस-पास नजर दौड़ाता था तो गुजरे 28 वर्षों पूर्व का दृश्य आँखों के सामने बरबस ही खींचा चला आता है। अठाईस वर्षों के बाद गर्मियों की इस शाम की शुरूआत में अपने शहर के पुराने चेहरे को याद करता हूं तो उसकी डूबती डबडबाती निगाहें सामने याद आती हैं । इन वर्षों में यह शहर भी बदला है। मैं भी बदला हूं एवं .शायद हम सबके रिश्ते भी बदल गए हैं।  इन बदलते परिस्थितियों में जब अपने आपको बीते वासर में ले जाता हू तो ऐसा लगता है कि बीते वर्षों में मेरे बचपन के परिचित इलाकों के मकान टूटे हैं, पेड़ नष्ट हुए हैं, गलियां गायब हुई हैं, वे लोग नही रहे है, जीवन शैलियां नही रही है। न जाने उस दिन क्या हो गया था पता ही नही चला। तमाम कोशिशों के बावजूद भी अतीत की यादें पूर सफर के दौरान मेरा पीछा करती ऱही। कभी अतीत में खो जाता था तो कभी शहर की जिंदगी से जुड़ जाता था तो कभी सामाजिक राजनीतिक विषय मन में कौंधने लगते थे।
मैंने अनुभव किया कि किसी के भी जीवन में फिर कभी किसी शहर का ही जीवन क्यों न हो अठाईस बरस कम नही होते हैं। पर अब भी इस शहर में ऐसे कितने ही इलाकों में ऐसा कितना ही कुछ बचा है, जो मुझे मेरे बचपन के शहर का ही लगता है। जिससे मैं अपने शहर को भी महसूस करता हूं और अपने बचपन को भी। इस ओवरब्रिज से देखने पर सियालदह स्टेशन या निकटवर्ती बाजार का नजारा भी तो बदला है। क्या यह स्टेशन और बाजार उतना ही पुराना नही है ! कुछ बदलाओं को छोड़ कर। इन विगत वर्षों में देह ही नही शहर की आत्मा भी बदला है। सोचता हूं, ये सब साथ-साथ ही बदलते होंगे।पुरानी गलियां नही रही और उनसे गुजरते हुए, उसमें बतियाते हुए लोग नही रहे। घर या किसी क्लब के करीब के चबूतरों पर बतियाते या खेलते हुए बूढ़े और बच्चे कम नजर आते हैं। लोगों की व्यवस्थाओं का स्वरूप भी बदला है, उनकी जीवन शैलियां और दृष्टियां भी बदली हैं। भोजपुरियन लोगों की भाषा में भी बदलाव आया है।  अब मेरे पड़ोस के बिहारी लोगों के अधिकांश घरों में लोग भोजपुरी की जगह खड़ी हिंदी का प्रयोग करते हैं। उनके बच्चे भी भोजपुरी भाषा भूलते जा रहे हैं। सोचता हूं, इसमें उन मासूम बच्चों का क्या दोष है! कभी-कभी यह भी लगता है कि पिछले अठाईस वर्षों में समाज की जगह सिकुड़ी है,व्यक्ति की जगह फैली है पर यह फासला वैसा फासला नही है जिसकी मानवीय आकांक्षाओं को कभी गढ़ा गया था। पुरानी पीढ़ी के बीच ये फासले और भी कम हुए हैं। बूढ़ों और बच्चों के बीच का पुराना संवाद, संबंध और सदभाव भी कम हुआ है। अन्यान्य कारणों से लोग अब अपना जितना समय सचमुच में परिवार के बीच बिताते हैं, बिताना चाहते हैं, उसमें गिरावट आई है। लगता है कि आदमी का अपने से भी संबंध कम होता गया है।    
 इसके बाद मेरी चिंतन धारा को एक नया आयाम मिला। अपने बारे में, अपने परिवार के संबंध में जब सोचने लगा तब मन बड़ा ही विकल हो उठा एवं आंखे नम होने लगी। बड़े भैया का निधन (2009) उसके करीब एक साल बाद (2010) मां जैसा प्यार और दुलार तथा वटवृक्ष की तरह शीतल छाया प्रदान करने वाली बड़ी भाभी का गुजर जाना एवं (2011)  में मझले भाई की अप्रत्याशित निधन के कारण मेरे अपने घर की ही धारणा और प्रभा भी बिखरती गयी है। मेरे घर के साथ-साथ पुराने घरों में व्याप्त सक्रियताएं, पारस्परिक संवाद और लगावों में भी बहुत कमी आई है। घर की अपनी जगह भी सिकुड़ती जा रही है। घर का अपना आत्म भी आहत हुआ है। क्या यह संभव हो सकता है कि आहत आत्म के घर में बसे हुए आदमी की अपनी आत्मा साबूत, स्थित और तनावहीन बनी रहे। लेकिन मेरे बचपन की बस्ती में पास-पड़ोस में मनुष्य की जितनी आवाजें सुनाई पड़ती थी अब उतनी नही । उन दिनों में एक आदमी दूसरे आदमी की, एक घर दूसरे घर की, एक परिवार दूसरे परिवार की चिंताओं और व्यथाओं से कम से कम निम्न मध्यवर्गीय इलाकों में तो जुड़ा हुआ रहता ही था। इन दिनों टेलिविजन और इंटरनेट नही हुआ करते थे। इनमें से टेलिविजन ने एक किस्म के लगाव को जन्म दिया है तो एक प्रकार के अलगाव को भी।
राग और विराग भले ही विपरीत दिशाओं में रहें पर शायद चलते साथ-साथ हैं। अपनी निगाहों से घरों, परिवारों में बढी हुई संवादहीनता को देखता हूं तब यह भी ख्याल आता है कि इस संवादहीनता के चलते या इसके कारण भी मानवीय सक्रियता का अभाव बढ़ता गया है। प्रतिरोध की राजनीति प्रभावित हुई है। परिवर्तन की आवाज सर्वत्र गुंजरित होने लगी है। सहयोग, मानवीय संवेदनाओं एव पीड़ा में निरंतर ह्वास देखने को मिल रहा है। सहयोग के धर्म का स्खलन हुआ है। मैं सोचता हूं कि संवाद, सहयोग और सक्रियता के भी अपने अंतर्संबंध होते होंगे। ये तीनों जब अपना संतुलन बना पाते होंगे तब समाज में सुख का जन्म होता होगा, शांति के दिनों में इतना विचारणीय और विवेकशील बना हुआ था, वही समाज इन तनावपूर्ण और हिंसक दिनों में कैसे इतना विचारहीन हो जाता है ।
इन्ही विचारों में डूबता उतराता रहा एवं बस कंडक्टर की कर्कश आवाज ने मुझे अचंभित कर दिया। इसके आगे मैं कुछ सोच पाता, उसकी आवाज इस बार काफी तेज थी। उसने बांगला भाषा में कहा , दादा कोताय नामबेन ( ओ भाई, कहां उतरिएगा)। बाहर झांक कर देखा तो मेरा बस स्टॉपेज आने वाला था। स्टॉपेज आने पर मैं बस से उतर तो गया लेकिन ऐसा लग रहा था कि बस के भीतर बैठे सभी यात्रियों की निगाहें मेरी ओर ही थी। पैदल चलते-चलते मन ही मन यही सोचता रहा कि अपने अतीत को, बीते दिनों के संघर्ष को कभी भुलाना नहीं चाहिए, लेकिन उसमें इतना भी नहीं खोना चाहिए कि वे यादें भविष्य के लिए बेडियों का काम करने लगें। भावनात्मक जुडाव तो होता है, लेकिन उससे निकलकर आगे भी तो बढना है। अतीत से जुडाव तो हमेशा ही रहता है, क्योंकि यह एक पेड की तरह है, जिसकी जडें हमेशा जमीन के अंदर होती हैं और जडें गहरी हैं- तभी पेड जिंदा है। अगर जडें ही मिट गई तो उसका अस्तित्व मिट जाता है। अब मैं अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गया हूं, जहां हर चीज अपनी पूर्णावस्था में परिलक्षित होती है।

***************************************************************************************************


अतीत से वर्तमान तक का सफर

अतीत से वर्तमान तक का सफर

                                       
                                    प्रस्तुतकर्ता :प्रेम सागर सिंह    
    
मैं मानता हूं कि समय के साथ अतीत को भुलाकर लोग आगे बढ सकते हैं लेकिन जीवन में सब कुछ भुलाया नहीं जा सकता। कुछ लमहे, कुछ अवसर ऐसे होते हैं, जिनके साथ हम हमेशा जीना चाहते हैं। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसे लमहे एवं कुछ अवसर आएं हैं, जिन्हे मैं आज तक कभी भी नहीं भुला पया बात सन 1984 की है। जब मैं सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज में विधि स्नातक के कोर्स में दाखिला लिया था। दाखिला मिलने के बाद मैं अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों से यह कहते हुए अपने आपको बड़ा ही गर्वित महसूस करता था कि बाबू राजेंद्र प्रसाद (भूतपूर्व राष्ट्रपति) भी इसी कालेज से ला (LL.B) की परीक्षा पास किए थे। उन दिनों मैं भारतीय वायु सेना में कार्यरत था। एक तो फौज की नौकरी और ऊपर से पढ़ाई का बोझ मुझे नीरस करता गया। मैं अपने रिश्तेदारों एवं फौजी भाईयों के बीच चर्चा का विषय बनता गया और इस चर्चा, कटाक्ष एवं उपहास ने मुझे कितना एकाग्रचित और गंभीर बना दिया था। इसे आज मैं उम्र की इस दहलीज पर पहुंच कर सोचता हूं तो मन सिहर सा जाता है। उन दिनों की यादें जीवन के हर एक पल में आज भी उसी तरह रची बसी हैं, जैसे पहले थीं। देखते-देखते समय कब गुजर गया पता ही नही चला। मैं भारतीय वायु सेना से रिटायर्ड होकर कोलकाता चला आया। यहां हमारा पुस्तैनी मकान है जिसमे हम चार भाई उस समय साथ ही रहते थे एवं उनमें से मै सबसे छोटा था।
विधि की विडंबना भी अजीब होती है। मेरे सामने अब तीन बच्चों का भविष्य नजर आने लगा। कोलकाता जैसे महानगर में 15 साल बाद आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा। मेरे कल्पना के अनुरूप परिस्थितियां विपरीत निकली। दोस्त, सगे संबंधी सब बदले-बदले से नजर आने लगे। लेकिन मैं हतोत्साहित नही हुआ एवं कुछ कर गुजरने का भाव मन में अहर्निश कौंधने लगा। इस विचार ने मुझे समुद्र में खोए हुए नाविक की भांति किनारे की तलाश के लिए बेचैन कर दिया। लोवर कोर्ट ,बैंकशाल कोर्ट एवं हाई कोर्ट तक का सफर एक वकील के रूप में करीब चार वर्ष तक तय करता रहा लेकिन जैसा चाहा था वैसा नही हुआ। एक बार मुझे महसूस हुआ कि मेरा शोषण किया जा रहा है लेकिन इस बात को मैंने किसी से भी शेयर नही किया। मैंने अनुभव किया कि इस पेशे में आने में बहुत देर हो गयी है। मेरी हालत सांप और छुछूदंदर जैसी हो गयी थी।
निराशा और अवसाद के इन दिनों में मैं अधीर सा हो गया था। मन ही मन इस पेशे से अलग होकर किसी दूसरे काम की तलाश करने लगा। कहते है  भाग्य भी बहादुर इंसान का साथ देता है। वही मेरे साथ भी हुआ। इंसपेक्टर ऑफ इनकम टैक्स से लेकर, एयर इंडिया एवं इंडियन एयरलाइंस की लिखित एवं मौखिक परीक्षाएं भी पास करते गया। लेकिन विधाता ने इन नौकरियों को शायद मेरे भाग्य में नही लिखा था। कहते हैं- भाग्य में जो लिखा होता है,वही मिलता है।“ मुझे भी विधाता ने वही दिया जो मेरे भाग्य में लिखा था यानि कोलकाता स्थित भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में (आयुध निर्माणी बोर्ड,कोलकाता) हिंदी अनुवादक का पद, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर इस ढलती वय में प्रभु के आशीर्वाद के रूप में ग्रहण किया। यहां से मैंने अपने जीवन को नए सिरे से जीना शुरू किया लेकिन यह सोचकर मन कभी-कभी संत्रस्त हो जाता है कि यह सफर 31 मार्च, 2015 को शेष हो जाएगा। इतना कुछ सोचने के बाद भी आशान्वित रहता हूं कि मेरी कुंडली में तीसरी सरकरी नौकरी लिखा है। काशऐसा संभव हो पाता।
बाबूघाट वाले ऑफिस से घर लोटते वक्त जब भी बस से सियालदह स्टेशन पार करता हूं, मेरी यादें मुझे बहुत पीछे की ओर खींच ले जाती हैं क्योंकि दाएं स्टेशन एवं बाएं मेरा सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज दिखता है। यहां पहुचते ही मेरा मन न जाने क्यूं उस अतीत से अनायास ही जुड़ जाता है जो कभी मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहा है । उन दिनों मै बहुत खोया लेकिन उससे अधिक पाया भी। कॉलेज के उन दिनों में मैं अपने दोस्तों के साथ-साथ निकटवर्ती बाजारों में कभीकभी घूमने जाया करता था। शायद गर्मियों का दिन रहता था एवं कुछेक को स्टेशन तक भी छोड़ने जाता था।
 सियालदह ओवरब्रिज पर ट्राफिक जाम के कारण जब आस-पास नजर दौड़ाता था तो गुजरे 28 वर्षों पूर्व का दृश्य आँखों के सामने बरबस ही खींचा चला आता है। अठाईस वर्षों के बाद गर्मियों की इस शाम की शुरूआत में अपने शहर के पुराने चेहरे को याद करता हूं तो उसकी डूबती डबडबाती निगाहें सामने याद आती हैं । इन वर्षों में यह शहर भी बदला है। मैं भी बदला हूं एवं .शायद हम सबके रिश्ते भी बदल गए हैं।  इन बदलते परिस्थितियों में जब अपने आपको बीते वासर में ले जाता हू तो ऐसा लगता है कि बीते वर्षों में मेरे बचपन के परिचित इलाकों के मकान टूटे हैं, पेड़ नष्ट हुए हैं, गलियां गायब हुई हैं, वे लोग नही रहे है, जीवन शैलियां नही रही है। न जाने उस दिन क्या हो गया था पता ही नही चला। तमाम कोशिशों के बावजूद भी अतीत की यादें पूर सफर के दौरान मेरा पीछा करती ऱही। कभी अतीत में खो जाता था तो कभी शहर की जिंदगी से जुड़ जाता था तो कभी सामाजिक राजनीतिक विषय मन में कौंधने लगते थे।
मैंने अनुभव किया कि किसी के भी जीवन में फिर कभी किसी शहर का ही जीवन क्यों न हो अठाईस बरस कम नही होते हैं। पर अब भी इस शहर में ऐसे कितने ही इलाकों में ऐसा कितना ही कुछ बचा है, जो मुझे मेरे बचपन के शहर का ही लगता है। जिससे मैं अपने शहर को भी महसूस करता हूं और अपने बचपन को भी। इस ओवरब्रिज से देखने पर सियालदह स्टेशन या निकटवर्ती बाजार का नजारा भी तो बदला है। क्या यह स्टेशन और बाजार उतना ही पुराना नही है ! कुछ बदलाओं को छोड़ कर। इन विगत वर्षों में देह ही नही शहर की आत्मा भी बदला है। सोचता हूं, ये सब साथ-साथ ही बदलते होंगे।पुरानी गलियां नही रही और उनसे गुजरते हुए, उसमें बतियाते हुए लोग नही रहे। घर या किसी क्लब के करीब के चबूतरों पर बतियाते या खेलते हुए बूढ़े और बच्चे कम नजर आते हैं। लोगों की व्यवस्थाओं का स्वरूप भी बदला है, उनकी जीवन शैलियां और दृष्टियां भी बदली हैं। भोजपुरियन लोगों की भाषा में भी बदलाव आया है।  अब मेरे पड़ोस के बिहारी लोगों के अधिकांश घरों में लोग भोजपुरी की जगह खड़ी हिंदी का प्रयोग करते हैं। उनके बच्चे भी भोजपुरी भाषा भूलते जा रहे हैं। सोचता हूं, इसमें उन मासूम बच्चों का क्या दोष है! कभी-कभी यह भी लगता है कि पिछले अठाईस वर्षों में समाज की जगह सिकुड़ी है,व्यक्ति की जगह फैली है पर यह फासला वैसा फासला नही है जिसकी मानवीय आकांक्षाओं को कभी गढ़ा गया था। पुरानी पीढ़ी के बीच ये फासले और भी कम हुए हैं। बूढ़ों और बच्चों के बीच का पुराना संवाद, संबंध और सदभाव भी कम हुआ है। अन्यान्य कारणों से लोग अब अपना जितना समय सचमुच में परिवार के बीच बिताते हैं, बिताना चाहते हैं, उसमें गिरावट आई है। लगता है कि आदमी का अपने से भी संबंध कम होता गया है।    
 इसके बाद मेरी चिंतन धारा को एक नया आयाम मिला। अपने बारे में, अपने परिवार के संबंध में जब सोचने लगा तब मन बड़ा ही विकल हो उठा एवं आंखे नम होने लगी। बड़े भैया का निधन (2009) उसके करीब एक साल बाद (2010) मां जैसा प्यार और दुलार तथा वटवृक्ष की तरह शीतल छाया प्रदान करने वाली बड़ी भाभी का गुजर जाना एवं (2011)  में मझले भाई की अप्रत्याशित निधन के कारण मेरे अपने घर की ही धारणा और प्रभा भी बिखरती गयी है। मेरे घर के साथ-साथ पुराने घरों में व्याप्त सक्रियताएं, पारस्परिक संवाद और लगावों में भी बहुत कमी आई है। घर की अपनी जगह भी सिकुड़ती जा रही है। घर का अपना आत्म भी आहत हुआ है। क्या यह संभव हो सकता है कि आहत आत्म के घर में बसे हुए आदमी की अपनी आत्मा साबूत, स्थित और तनावहीन बनी रहे। लेकिन मेरे बचपन की बस्ती में पास-पड़ोस में मनुष्य की जितनी आवाजें सुनाई पड़ती थी अब उतनी नही । उन दिनों में एक आदमी दूसरे आदमी की, एक घर दूसरे घर की, एक परिवार दूसरे परिवार की चिंताओं और व्यथाओं से कम से कम निम्न मध्यवर्गीय इलाकों में तो जुड़ा हुआ रहता ही था। इन दिनों टेलिविजन और इंटरनेट नही हुआ करते थे। इनमें से टेलिविजन ने एक किस्म के लगाव को जन्म दिया है तो एक प्रकार के अलगाव को भी।
राग और विराग भले ही विपरीत दिशाओं में रहें पर शायद चलते साथ-साथ हैं। अपनी निगाहों से घरों, परिवारों में बढी हुई संवादहीनता को देखता हूं तब यह भी ख्याल आता है कि इस संवादहीनता के चलते या इसके कारण भी मानवीय सक्रियता का अभाव बढ़ता गया है। प्रतिरोध की राजनीति प्रभावित हुई है। परिवर्तन की आवाज सर्वत्र गुंजरित होने लगी है। सहयोग, मानवीय संवेदनाओं एव पीड़ा में निरंतर ह्वास देखने को मिल रहा है। सहयोग के धर्म का स्खलन हुआ है। मैं सोचता हूं कि संवाद, सहयोग और सक्रियता के भी अपने अंतर्संबंध होते होंगे। ये तीनों जब अपना संतुलन बना पाते होंगे तब समाज में सुख का जन्म होता होगा, शांति के दिनों में इतना विचारणीय और विवेकशील बना हुआ था, वही समाज इन तनावपूर्ण और हिंसक दिनों में कैसे इतना विचारहीन हो जाता है ।
इन्ही विचारों में डूबता उतराता रहा एवं बस कंडक्टर की कर्कश आवाज ने मुझे अचंभित कर दिया। इसके आगे मैं कुछ सोच पाता, उसकी आवाज इस बार काफी तेज थी। उसने बांगला भाषा में कहा , दादा कोताय नामबेन ( ओ भाई, कहां उतरिएगा)। बाहर झांक कर देखा तो मेरा बस स्टॉपेज आने वाला था। स्टॉपेज आने पर मैं बस से उतर तो गया लेकिन ऐसा लग रहा था कि बस के भीतर बैठे सभी यात्रियों की निगाहें मेरी ओर ही थी। पैदल चलते-चलते मन ही मन यही सोचता रहा कि अपने अतीत को, बीते दिनों के संघर्ष को कभी भुलाना नहीं चाहिए, लेकिन उसमें इतना भी नहीं खोना चाहिए कि वे यादें भविष्य के लिए बेडियों का काम करने लगें। भावनात्मक जुडाव तो होता है, लेकिन उससे निकलकर आगे भी तो बढना है। अतीत से जुडाव तो हमेशा ही रहता है, क्योंकि यह एक पेड की तरह है, जिसकी जडें हमेशा जमीन के अंदर होती हैं और जडें गहरी हैं- तभी पेड जिंदा है। अगर जडें ही मिट गई तो उसका अस्तित्व मिट जाता है। अब मैं अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गया हूं, जहां हर चीज अपनी पूर्णावस्था में परिलक्षित होती है।

***************************************************************************************************


Monday, June 10, 2013

भूख का सामासिक चित्रण

            
            भूख का सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं राजनीतिक पहलू
            
                                                                               
                                           प्रेम सागर सिंह

हमारे समकालीन सोच-विचार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि .गरीब के बारे में सिर्फ अमीर विचार करते हैं। गरीब अपने गरीबी के बारे में विचार करता नही पाया जाता। अपने बारे में इस कदर विचार विहीन होने के बारे में भी गरीब कभी नही बोलता। यह बात भी अमीर ही बताते हैं कि गरीब अपनी गरीबी के बारे में इस कारण विचार नही कर पाता क्योंकि वह गरीब है। उसके पास इतनी फुरसत नही कि अपनी गरीबी के बारे में सोचे-विचारे। यह काम भी उन्हे करना पड़ता है। इस तरह गरीबी के चिंतन में, हर विमर्श में गरीब एक विषय बना रहता है जिसका, जो उस जैसे नही है, अध्ययन करते रहते हैं। उसकी कहते रहते हैं। यानि कि जो उसके बारे में सोचते दुबले हुए जाते हैं वे ही गरीब से पूछे बिना उसके मुख्तार और पेशकार बन जाते हैं। योजना आयोग हो या ऐसा अन्य कोई आयोग या संस्थान वह जब गरीबी के बारे में सोचता विचारता है गरीबी के बहुत दूर बैठ कर गरीबी के बारे में सोचता नजर आता है। इससे विचित्र किंतु सत्य किस्म के विमर्श पैदा होते हैं जो नीति निर्धारण के काम आते बताए जाते हैं। इस तरह हर नीति निर्धारण, अपने चिंतनीय विषय से एक निश्चित दूरी बनाए रखता हैं।

नरेगा हो या मनरेगा या कैश ट्रांसफर और भोजन सुरक्षा योजना आदि का स्मरण करते हुए चिंतक अमीर वर्ग बार-बार एक ही सिरे पर पहुँच कर पूछते कि ठीक है यह सब है, लेकिन इनसे क्या होने वाला है!इस सबसे भ्रष्टाचार और मुद्रास्फीति बढेगी ही, सरकार पैसा कहाँ से लाएगी। यह वितर्क उस कोने से आता है जिसके पास अपनी हैसियत और सोचने की ताकत को बनाए रखने की एन.जी.ओ. गारंटी है। विचार के लिए जो अतिरिक्त ताकत चाहिए वह यहाँ जुटाई जा सकती है। विचार का ताकत से यह रिश्ता इन दिनों अक्सर दृश्यमान होने लगा है। सोचने- विचारने  वालों  की वार्ता शैली और देहभाषा एक सी है। कृशकाय कुपोषित की देहभाषा से कितनी अलग दिखती है वह देहभाषा।

मुक्ति की गारंटी देने वाले भले ही लेकिन इन दिनों विरल ही चले क्रांतिकारी हों या उदार वैश्विक नीति निर्धारक हों या स्थानीय चिंतक हों, उनका  नीति चिंतन अक्सर अपने विषय से नही जुड़ पाता। इसीलिए नीति पर नीति बनाने की अनीति उपहासास्पद बनती रहती है। आज भारत के हर कोने में भोजन की कमी के कारण कुपोषण एवं मृत्यु की खबरें हम सब तक पहुंचती है, सरकार के कानों में भी जाती है ,लेकिन इसका तुरंत समाधान नही होता है। कई जगहों पर ऐसे लोग मिलते हैं जो पूरा भोजन नही कर पाते। भूख से मरने वालों की खबरें आ-आकर चौंकाने लगती है। जब-जब भोजन सुरक्षा की बात चलती है तब कोई न कोई कहीं न कहीं भूख से मर जाता है। भूख की चर्चा से भूख नही भागा करती। कहने की जरूरत नही कि अत्यंत गरीबी और भुखमरी के निजी अनुभव के बिना होती बहसें, निर्धारित नीतियां और कार्रवाईयां भले इरादों के बावजूद उस भूख से बहुत दूर पड़ी रह जाती हैं जो एक ही साथ एक आर्थिक पहलू भी रखती है। सांस्कृतिक पहलू की बात महत्वपूर्ण है। भूख का सांस्कृतिक पहलू उसी भाषा में बेहतर अनुभव किया और समझा जा सकता है जो भूख के भीतर बनती है। भूख के भीतर बनती भाषा पहले पेट भरने की शर्त लगाती है बाद में बोलने लायक होती है। इसीलिए भूखा बोलता नही।भोजन का इंतजार करता है। जरा, दलितों की आत्मकथाएं पढ़े, उनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग भीख और भोजन के बीच बनते  बिगड़ते रहते हैं।

हमारी तमाम भाषाओं की सबसे बड़ा सीमा यह है कि वे भरे पेट की भाषाएं हैं। भूखे की भाषा नही है। भूख और भूखे का अनुभव वहां उधार लिया जाता है। यह अनूदित होकर आता है यहीं भोजन नीति की राजनीति घुसती है और भूख के उपचार के विचार को बांट जाती है। जिन अंचलों में गरीबी है, जो पूरा दाना पानी नही पाते उनकी भाषाएं किसी हद तक भूख के पास की भाषाएं हैं जो अक्सर मातृभाषाएं हैं। उनसें भूख किसी कहानी किसी गीत की तरह आती है।
                      
हमारे साहित्य में भूख के अनुभव के विकट दृश्य हैं जो खुद बताते हैं कि भूख का माध्यम मातृभाषाएं हैं, वो बताती हैं कि भूख पहले भी रही है। भूख का जिक्र मातृभाषाओं में लिखे-कहे गए साहित्य में आता है। कवि और कथाकारों ने भूख को जब-तब अपना वियय बनाया है. जब-जब ऐसा हुआ है तब-तब भूख का वर्णन किसी नीति निचोड़ू से कहीं अधिक मार्मिक और व्याकुल कर देने वाला होता है। जब हम अपने भरे पेट को भूलकर एक पल के लिए अपनी ही भूख के बारे में सोच कर डरने लगते हैं।

भूख की सारी भाषाओं में भूख के कुछ अनुभवित मुहावरें भी हैं जो कि बुभुक्षा के बारे में पहले हुए सोच विचार को बताते हैं। वे तमाम मुहावरें एवं अभिव्यक्तियां जितनी सांस्कृतिक है उतनी ही आर्थिक भी हैं, राजनीतिक भी हैं। जिसे भूख की पीड़ा न सताई उसे भूख का विचार किस तरह सता सकता है! एक कहावत चली आती है जाके पैर न फटी वेवाई सो का जाने पीर पराई!” इस मुहावरे का मर्म वही जान सकता है जिसकी बिवाई फटी हो। बिवाई तब फटती है जब नंगे पैर कठोर मार्ग पर चलें, गरमी और सर्दी  में चले, पैर खुले रहें यानि उपानह रहित रहें। बिवाई गरीबों की देन है।

भूख का दूसरा पहलू सांस्कृतिक है:  भूखे भजन न होई गुपाला ये लेहुं अपनी कंठी माला! जाहिर है कि भूख नया विषय नही है, हिंदुस्तान में यह हमेशा से रहा है। इन दिनों भूख के शास्त्र को अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक गढते है जो एक बार में एक नीति से सब भूखों तक भोजन पहुंचाने का उद्यम करते हैं लेकिन हर खाद्य नीति भूखे तक पहुंचते-पहुंचते गड़बड़ा जाती है। भूख का शास्त्र भूखे का नही बन पाता। कुपोषण का उपचार नही कर पाता। भूख का हर शास्त्र कुपोषण से जुड़ा है और कुपोषण सप्लाई में उतना नही कि जितना कि बनी और बना दी गई आदतों से जुड़ा है।

जो लोग भूख को, गरीबों की कैलोरी से जोड़कर चलते हैं वे यह तक बताते हैं कि इतनी दाल इतना भात इतना सब्जी से इतनी कैलोरी मिल सकती है। लेकिन हिंदुस्तान के जो भरे पेट हैं वे इसका हिसाब नही रख पाते कि वे इतनी कैलोरी खाते हैं! स्वाद के संस्कृति में रोटी दाल गिन कर नही खाई जाती। भर पेट खाने को ही खाना कहते हैं। एक बार पुन: कहना चाहूंगा कि भूख जितना आर्थिक प्रश्न है उतना ही सांस्कृतिक भी। निराला जी की एक कविता है  भिखारी जिसमें भिखारी का जो वर्णन है वह अब तक साहित्य में प्रामाणिक है: -

वह आता,
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता,
पेट पीठ मिलकर है एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुठ्टी भर दाने को,
भूख मिटाने को,
मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता।

इस तरह हम देखते हैं कि पूरी कविता में वह भिखारी हमारे भरे पेट को अपराध की तरह बताता है। इसीलिए हम उसकी यथार्थवादी खूबसूरती की चर्चा करते हैं, भूखे के अनुभव को महसूस करने की जगह प्रगतिशील सौंदर्य दिखाने लगते हैं। उसी तरह प्रेमचंद की कहानी कफनभूख और भोजन का अनुभव कराने वाली है। जचगी के दौरान घर में मर चुकी बहू के लिए घीसू, माधव धनीमानियों से मांग कर जब कफन खरीदने बाजार में आते हैं तो कफन लेने की जगह सब्जीपूरी जलेबी और शराब में पैसा खर्च कर देते हैं और गाना गाने लगते हैं:  ठगिनी क्यों नैना झमकावै ! पता नही कि वे इसके जरिए भूख के बारे में कुछ कह रहे हैं या मर चुकी बहू के बारे में या पैसे के बारे में! लेकिन भूख उन्हे जिस कदर का बेगानापन देती है, सारी कहानी उसका निचोड़ है। कहने का मतलब यह है कि भूख के शास्त्र को पहले मातृभाषा में होना होगा फिर उसे उसके सांस्कृतिक पहलूओं से जुड़ना होगा तब जाकर आप उस भूख के पास पहुंच पाएंगे जो आप तक नही आई है। भूख का शास्त्र भूखे के अनुभव से जुड़े बिना सही नीति नही बना सकता।
                    
                         
                               (www.premsarowar.blogspot.com)