Friday, August 17, 2012

राही मासूम रजा


राही मासूम रजा की कविता  मैं एक फेरी बालासे साभार उद्धरित -

  (राही मासूम रजा)

प्रस्तुतकर्ता: प्रेम सागर सिंह

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।

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17 comments:

  1. लाजवाब अभिवयक्ति , बहुत कुछ कहती एक शानदार रचना ।

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  2. नीम का पेंड़ याद आ गया।

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  3. मानवता को समर्पित ऐसी रचना और रचनाकार को प्रणाम साथ ही आपके सुखद प्रयास को भी नमन

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  4. राही मासूम रजा की कविता पढवाने के लिए आभार,,,,
    RECENT POST...: शहीदों की याद में,,

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  5. वाह....
    उद्वेलित करती रचना....

    साझा करने का शुक्रिया प्रेमसरोवर जी.
    सादर
    अनु

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  6. "कविता" समाज में धर्मवाद के दंश को जी रहे मन की गहरी अभिव्यक्ति है. और ये चोट करती है, आज के समाज के उस सोच को जिसमें 'धर्म' 'मानवता' से बड़ा हो जाता है.

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    1. बहुत सही कहा है आपने..।

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  7. मन को झकझोर देने वाली कविता .... इसे यहाँ प्रस्तुत करने के लिए आभार

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  8. महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
    ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
    गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।

    एक सच्चे भारतीय का आक्रोश !

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  9. बेहद सशक्‍त भाव लिए उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

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  10. सशक्‍त भाव.
    साझा करने का शुक्रिया.

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  11. राही मासूम रजा की यह कविता कठमुल्लापन अर्थात अंधश्रद्धा की हकीकत बयां करती है.
    प्रस्तुति के लिए साधुवाद.

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    1. आपकी बातों में दम है, रावत जी ।

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  12. बेहद सशक्त अभिव्यक्ति...

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार प्रेम सरोवर जी .

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