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Sunday, November 10, 2013

छठ माई को याद करने के बहाने।

छठ मैया को पुन: याद करने के बहाने।
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                                   प्रेम सागर सिंह


बिहार के कण कण में छठ बसता है, क्या भोजपुर, क्या मिथिला और क्या मगध ,समूचा बिहार एक साथ,उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल भी धीरे- धीरे रंग गया साथ में | छठ महापर्व आरम्भ हो गया | सूर्य की आराधना वाला यह पर्व अपने जैसा एकलौता | दुनिया में शायद ही कोई पर्व होगा जिसमे आप अपने आराध्य की अर्चना कीजिये और दर्शन तुरंत हो जाता हो | शायद यही कारण है की कोई धर्म की रीति इसे काट नहीं पाती | उर्जा और रोशनी देने वाले महामहिम सूर्य की आराधना का पर्व |

छठी मैया की महिमा को शब्दों में कहना मुश्किल है, भावना अभिव्यक्त करना कठिन है,सिर्फ यही कह सकता हूँ इनका स्मरण मात्र ही हम में से हरेक के अंदर हर्ष और उल्हास तो प्रस्फूटित तो करता ही है , आँखे भी नम हो जाती हैं | बिहार से बाहर रहने वाले बिहारियों की भी|कुछ लौटते है कम से कम साल में एक बार | जो नहीं लौट पाते रो लेते हैं जन्मभूमि को याद कर ,धीरे- धीरे जहाँ है वहां ही चालू कर देते हैं।
बचपन में , 1 महीना पहिले चले जाते थे कुदाल , खुरपी , तगाड़ी लेके घाट बनाने पोखरा पे , हमारे लिए छठ यही था, घाट साफ़ कीजिये जैसे एक किसान खेतों को करता है, फिर उसके ऊपर बाबू जी के इनिसियल खोद दीजिए , बुक हो गया घाट हमारे नाम पर| कलसुप रखने के लिए जगह बनाए , शाम को कलसुप पश्चिम के तरफ रहेगा ,भोर में पूर्व दिशा में | थोड़े बड़े हुए तो दौरा उठाना,किसी का ये कहना की छठ का आधा पुण्य दौरा उठाने वाले को मिलता है | छठ के लिए लाइट लगता है, जेनेरटर भी , हर महल्ला से घाट तक, का शरीफ, का रंगबाज, का लैका, का जवान,सब समाज सेवी बन जाते हैं,सच्चे मन से| सुबह सुबह चाय का स्टाल लगते थे, शुद्ध दूध का चाय पीजिए फ्री में |

शारदा सिन्हा की आवाज जैसे छठी माई खुद गा रही हों “ दौरा घाटे पहुचा “,ऐसे लगता है उनका गाना न हो तो सूर्य देवता उगे ही न|सही में माँ ही की आवाज है| छठ नहीं कर पायें तो क्या,छठ देखिये,रोड साफ़ कीजिये,दौरा उठाइए, कहने का मतलब है सबके लिए मौका है छठ के रंग में रंग जाने का |

आज कल की महिलाएँ बालों में कही छुपा के सिंदूर लगाती है ताकि LS न लगे, छठ में देखिये जो नाक से सिंदूर लगता है माँग तक , कही से LS (Low Society) लगता , ऐसा लगता है सुहागन शायद आज के लिए बनी थी , सिंदूर का गर्व इसी दिन के लिए है,पति को भी गर्व का अहसास होता है |
भोर का अरघ के बाद प्रसाद मांगिये , मांग के खाते है , चाहे बिज़नसमैन हों य कलक्टर , मांग के प्रसाद नहीं खाया तो मतलब नहीं है प्रसाद का | छठ का ठेकुआ आज तक कोई दुबारा वैसा नहीं बना पाया है , कतनो मिटटी के चुल्ला लगाइए , कतनो घी डालिए , श्रद्धा नहीं आ पायेगा , प्रसाद है छठ तक रुकना परेगा |
अगर छठ के दिन घर पर नहीं रहे तो जिंदगी की सारी पढाई लिखाई, मेहनत सब व्यर्थ है , बिना मतलब की है ! मन ही मन छठी मैया तोहरा गोर लागतानी, माफ कर दिहा, अगला बरिस जरुर आईब  ए माई |

Monday, November 4, 2013

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है: हरिवंश राय बच्चन

                   
         प्रेम सागर सिंह


कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम
प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना
पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा
एक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतर
भर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गा
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आए
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है.

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Monday, June 10, 2013

भूख का सामासिक चित्रण

            
            भूख का सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं राजनीतिक पहलू
            
                                                                               
                                           प्रेम सागर सिंह

हमारे समकालीन सोच-विचार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि .गरीब के बारे में सिर्फ अमीर विचार करते हैं। गरीब अपने गरीबी के बारे में विचार करता नही पाया जाता। अपने बारे में इस कदर विचार विहीन होने के बारे में भी गरीब कभी नही बोलता। यह बात भी अमीर ही बताते हैं कि गरीब अपनी गरीबी के बारे में इस कारण विचार नही कर पाता क्योंकि वह गरीब है। उसके पास इतनी फुरसत नही कि अपनी गरीबी के बारे में सोचे-विचारे। यह काम भी उन्हे करना पड़ता है। इस तरह गरीबी के चिंतन में, हर विमर्श में गरीब एक विषय बना रहता है जिसका, जो उस जैसे नही है, अध्ययन करते रहते हैं। उसकी कहते रहते हैं। यानि कि जो उसके बारे में सोचते दुबले हुए जाते हैं वे ही गरीब से पूछे बिना उसके मुख्तार और पेशकार बन जाते हैं। योजना आयोग हो या ऐसा अन्य कोई आयोग या संस्थान वह जब गरीबी के बारे में सोचता विचारता है गरीबी के बहुत दूर बैठ कर गरीबी के बारे में सोचता नजर आता है। इससे विचित्र किंतु सत्य किस्म के विमर्श पैदा होते हैं जो नीति निर्धारण के काम आते बताए जाते हैं। इस तरह हर नीति निर्धारण, अपने चिंतनीय विषय से एक निश्चित दूरी बनाए रखता हैं।

नरेगा हो या मनरेगा या कैश ट्रांसफर और भोजन सुरक्षा योजना आदि का स्मरण करते हुए चिंतक अमीर वर्ग बार-बार एक ही सिरे पर पहुँच कर पूछते कि ठीक है यह सब है, लेकिन इनसे क्या होने वाला है!इस सबसे भ्रष्टाचार और मुद्रास्फीति बढेगी ही, सरकार पैसा कहाँ से लाएगी। यह वितर्क उस कोने से आता है जिसके पास अपनी हैसियत और सोचने की ताकत को बनाए रखने की एन.जी.ओ. गारंटी है। विचार के लिए जो अतिरिक्त ताकत चाहिए वह यहाँ जुटाई जा सकती है। विचार का ताकत से यह रिश्ता इन दिनों अक्सर दृश्यमान होने लगा है। सोचने- विचारने  वालों  की वार्ता शैली और देहभाषा एक सी है। कृशकाय कुपोषित की देहभाषा से कितनी अलग दिखती है वह देहभाषा।

मुक्ति की गारंटी देने वाले भले ही लेकिन इन दिनों विरल ही चले क्रांतिकारी हों या उदार वैश्विक नीति निर्धारक हों या स्थानीय चिंतक हों, उनका  नीति चिंतन अक्सर अपने विषय से नही जुड़ पाता। इसीलिए नीति पर नीति बनाने की अनीति उपहासास्पद बनती रहती है। आज भारत के हर कोने में भोजन की कमी के कारण कुपोषण एवं मृत्यु की खबरें हम सब तक पहुंचती है, सरकार के कानों में भी जाती है ,लेकिन इसका तुरंत समाधान नही होता है। कई जगहों पर ऐसे लोग मिलते हैं जो पूरा भोजन नही कर पाते। भूख से मरने वालों की खबरें आ-आकर चौंकाने लगती है। जब-जब भोजन सुरक्षा की बात चलती है तब कोई न कोई कहीं न कहीं भूख से मर जाता है। भूख की चर्चा से भूख नही भागा करती। कहने की जरूरत नही कि अत्यंत गरीबी और भुखमरी के निजी अनुभव के बिना होती बहसें, निर्धारित नीतियां और कार्रवाईयां भले इरादों के बावजूद उस भूख से बहुत दूर पड़ी रह जाती हैं जो एक ही साथ एक आर्थिक पहलू भी रखती है। सांस्कृतिक पहलू की बात महत्वपूर्ण है। भूख का सांस्कृतिक पहलू उसी भाषा में बेहतर अनुभव किया और समझा जा सकता है जो भूख के भीतर बनती है। भूख के भीतर बनती भाषा पहले पेट भरने की शर्त लगाती है बाद में बोलने लायक होती है। इसीलिए भूखा बोलता नही।भोजन का इंतजार करता है। जरा, दलितों की आत्मकथाएं पढ़े, उनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग भीख और भोजन के बीच बनते  बिगड़ते रहते हैं।

हमारी तमाम भाषाओं की सबसे बड़ा सीमा यह है कि वे भरे पेट की भाषाएं हैं। भूखे की भाषा नही है। भूख और भूखे का अनुभव वहां उधार लिया जाता है। यह अनूदित होकर आता है यहीं भोजन नीति की राजनीति घुसती है और भूख के उपचार के विचार को बांट जाती है। जिन अंचलों में गरीबी है, जो पूरा दाना पानी नही पाते उनकी भाषाएं किसी हद तक भूख के पास की भाषाएं हैं जो अक्सर मातृभाषाएं हैं। उनसें भूख किसी कहानी किसी गीत की तरह आती है।
                      
हमारे साहित्य में भूख के अनुभव के विकट दृश्य हैं जो खुद बताते हैं कि भूख का माध्यम मातृभाषाएं हैं, वो बताती हैं कि भूख पहले भी रही है। भूख का जिक्र मातृभाषाओं में लिखे-कहे गए साहित्य में आता है। कवि और कथाकारों ने भूख को जब-तब अपना वियय बनाया है. जब-जब ऐसा हुआ है तब-तब भूख का वर्णन किसी नीति निचोड़ू से कहीं अधिक मार्मिक और व्याकुल कर देने वाला होता है। जब हम अपने भरे पेट को भूलकर एक पल के लिए अपनी ही भूख के बारे में सोच कर डरने लगते हैं।

भूख की सारी भाषाओं में भूख के कुछ अनुभवित मुहावरें भी हैं जो कि बुभुक्षा के बारे में पहले हुए सोच विचार को बताते हैं। वे तमाम मुहावरें एवं अभिव्यक्तियां जितनी सांस्कृतिक है उतनी ही आर्थिक भी हैं, राजनीतिक भी हैं। जिसे भूख की पीड़ा न सताई उसे भूख का विचार किस तरह सता सकता है! एक कहावत चली आती है जाके पैर न फटी वेवाई सो का जाने पीर पराई!” इस मुहावरे का मर्म वही जान सकता है जिसकी बिवाई फटी हो। बिवाई तब फटती है जब नंगे पैर कठोर मार्ग पर चलें, गरमी और सर्दी  में चले, पैर खुले रहें यानि उपानह रहित रहें। बिवाई गरीबों की देन है।

भूख का दूसरा पहलू सांस्कृतिक है:  भूखे भजन न होई गुपाला ये लेहुं अपनी कंठी माला! जाहिर है कि भूख नया विषय नही है, हिंदुस्तान में यह हमेशा से रहा है। इन दिनों भूख के शास्त्र को अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक गढते है जो एक बार में एक नीति से सब भूखों तक भोजन पहुंचाने का उद्यम करते हैं लेकिन हर खाद्य नीति भूखे तक पहुंचते-पहुंचते गड़बड़ा जाती है। भूख का शास्त्र भूखे का नही बन पाता। कुपोषण का उपचार नही कर पाता। भूख का हर शास्त्र कुपोषण से जुड़ा है और कुपोषण सप्लाई में उतना नही कि जितना कि बनी और बना दी गई आदतों से जुड़ा है।

जो लोग भूख को, गरीबों की कैलोरी से जोड़कर चलते हैं वे यह तक बताते हैं कि इतनी दाल इतना भात इतना सब्जी से इतनी कैलोरी मिल सकती है। लेकिन हिंदुस्तान के जो भरे पेट हैं वे इसका हिसाब नही रख पाते कि वे इतनी कैलोरी खाते हैं! स्वाद के संस्कृति में रोटी दाल गिन कर नही खाई जाती। भर पेट खाने को ही खाना कहते हैं। एक बार पुन: कहना चाहूंगा कि भूख जितना आर्थिक प्रश्न है उतना ही सांस्कृतिक भी। निराला जी की एक कविता है  भिखारी जिसमें भिखारी का जो वर्णन है वह अब तक साहित्य में प्रामाणिक है: -

वह आता,
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता,
पेट पीठ मिलकर है एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुठ्टी भर दाने को,
भूख मिटाने को,
मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता।

इस तरह हम देखते हैं कि पूरी कविता में वह भिखारी हमारे भरे पेट को अपराध की तरह बताता है। इसीलिए हम उसकी यथार्थवादी खूबसूरती की चर्चा करते हैं, भूखे के अनुभव को महसूस करने की जगह प्रगतिशील सौंदर्य दिखाने लगते हैं। उसी तरह प्रेमचंद की कहानी कफनभूख और भोजन का अनुभव कराने वाली है। जचगी के दौरान घर में मर चुकी बहू के लिए घीसू, माधव धनीमानियों से मांग कर जब कफन खरीदने बाजार में आते हैं तो कफन लेने की जगह सब्जीपूरी जलेबी और शराब में पैसा खर्च कर देते हैं और गाना गाने लगते हैं:  ठगिनी क्यों नैना झमकावै ! पता नही कि वे इसके जरिए भूख के बारे में कुछ कह रहे हैं या मर चुकी बहू के बारे में या पैसे के बारे में! लेकिन भूख उन्हे जिस कदर का बेगानापन देती है, सारी कहानी उसका निचोड़ है। कहने का मतलब यह है कि भूख के शास्त्र को पहले मातृभाषा में होना होगा फिर उसे उसके सांस्कृतिक पहलूओं से जुड़ना होगा तब जाकर आप उस भूख के पास पहुंच पाएंगे जो आप तक नही आई है। भूख का शास्त्र भूखे के अनुभव से जुड़े बिना सही नीति नही बना सकता।
                    
                         
                               (www.premsarowar.blogspot.com)






Friday, March 29, 2013

उदात्त प्रेम का क्षैतिज स्वरूप


मेरे चिंतन फ्रेम में मोहन राकेश का नाटक आषाढ़ का एक दिन

                                                                   

प्रेम और विरह का अन्यान्योश्रित संबंध है। विरह की अग्नि में तपकर प्रेम स्वर्ण सा चमक उठता है। जीवन की समस्त वासनाएं, कलुष उस अग्नि में जलकर भस्मीभूत हो उठते हैं। वेदना की टीस और पीड़ा का साम्राज्य सहृदय पाठक के अंदर मार्मिक संवेदनाओं को जाग्रत कर देता है और उसे भावभूमि के उस लोक में प्रतिष्ठित कर देता है जहां उसका हृदय रागात्मक वृति की दिव्य भूमि पर उदभाषित हो उठता है। इन्ही परिस्थतियों के आलोक में इस उपन्यास की नायिका मल्लिका का स्मृतिजन्य वियोग उसके निश्छल प्रेम एवं समर्पण की ऐसी पराकाष्ठा है जिसमें उदात्त भावोर्मियां तरंगायित हो रही हैं। .. प्रेम सागर सिंह


आषाढ़ का एक दिन (1958) मोहन राकेश का पहला और सर्वोत्तम नाटक ही नही हिंदी नाटक की महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसमें पावन प्रेम की परिकल्पना है और उत्सर्ग की भावना का चरमोत्कर्ष है, जीवन के परिस्पंदनों की अभिव्यक्ति है। सूक्ष्म अनुभूतियों एवं संवेदनाओं का आकृष्ट आवेग आषाढ़ का एक दिन को कालजयी बनाने में सार्थक सिद्ध हुआ है। एक सफल नाटककार होने के कारण मोहन राकेश  जी ने इस उपन्यास में युग-युगों से कुछ ज्वलंत प्रश्नों को ऐतिहासिक तथ्यों एवं परिवेश वाले चिंतन फ्रेम में संवारकर हमारे सामने प्रस्तुत किया है। इसमें रेखांकित प्रेम का स्वरूप एवं विषय आधुनिक युग में भी अनुसंधान का विषय बना हुआ है। इस नाटक के हर खंड क अंत में "कालिदास मल्लिका को अकेला छोड़ जाता है: पहले जब वह अकेला उज्जयिनी चला जाता है; दूसरा जब वह गाँव आकर भी मल्लिका से जानबूझ कर नहीं मिलता; और तीसरा जब वह मल्लिका के घर से अचानक मुड़ के निकल जाता है।"यह खेल दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के प्रयास की मल्लिका और कालिदास को कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयिनी में बस जाता है तो उसकी ख्याति और उसका रुतबा तो बढ़ता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी,प्रियंगुमंजरी, इस प्रयास में जुटी रहती है कि उज्जयिनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा वातावरण बना रहे "लेकिन वह स्वयं मल्लिका कभी नहीं बन पाती। नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तो वह क़ुबूल करता है कि "तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है यह वह कालिदास नहीं जिसे तुम जानती थी।"

इस उपन्यास की नायिका मल्लिका प्रेम की साक्षात प्रतिमा है जिसके अंदर दलित द्राक्षा के समान सभी कुछ निस्वार्थ भाव से समर्पित कर देने की अबाध भाव-राशि तरंगायित हो रही है। वह अपने कवि कालिदास के व्यक्तित्व के विकास के लिए जीवन के समस्त क्षुद्र स्वार्थों को त्याग कर अपने अभावों की कटु विभीषिका में पल-पल मरती हुई अपने आपको होम कर देती है। वह प्रेम मार्ग पर चलने वाली अनन्य साधिका है। न जाने वह कितनी बार आषाढ के प्रथम चरण में भींगी है, न जाने कितनी बार उसके साथ आँखों की पालकी में स्वप्निल चित्र बसाए हैं। समस्त ग्राम प्रांतर में, वही अकेली है जो कालिदास को समझती है, उसकी मर्म वेदना का संधान कर सकती है। जब उसकी माँ अम्बिका लोक अपवाद से ग्रस्त होकर मल्लिका को सचेत करते हुए कालिदास से विवाह करने के लिए कहती है तब वह स्पष्ट शब्दों में अपनी माँ को प्रतिउत्तर देते हुए कहती है –“तुम जानती हो मैं विवाह करना नही चाहती ; फिर उसके लिए प्रयास क्यों करती हो। वह प्रेम को अलौकिक एवं अनुभूतिगम्य मानते हुए कहती है – “मैंने भावना का वरण किया है, मेरे लिए वह संबंध और संबंधों से बड़ा है। मैं वास्तव में अपनी भावना से प्रेम करती हूं, जो पवित्र है ,अनश्वर है, कोमल है। वह जीवन की स्थूल आवश्यकताओं को ही जीवन का प्राप्य नही मानती बल्कि उसके अनुसार मनुष्य की इन आवश्यकताओं से परे भी इतना कुछ है जिसकी अनुभूति हम कर सकते हैं। उसके साथ अपनी भावनाओं का तादाम्य स्थापित कर सकते हैं।
मल्लिका की माँ उसके भविष्य को लेकर अपनी स्वभाविक चिंता, अपने अंतर्द्वद्व को व्यक्त करते हुए उससे कहती है – “ वह व्यक्ति आत्मनिष्ठ है। संसार में अपने सिवाय किसी से मोह नही करता । मैं भी चाहती हूं

तुम आज समझ लो। तुम कहती हो तुम्हारा उससे भावना का संबंध है। वह भावना क्या है ! यदि वास्तव में उसका तुमसे भावना का संबंध है तो वह क्यों तुमसे विवाह करना नही चाहता ! मैं ऐसे व्यक्ति को अच्छी तरह से समझती हूं। उसका तुम्हारे साथ इतना ही संबंध है कि तुम एक उपादान हो, जिसके आश्रय में वह अपने से प्रेम कर सकता है, अपने पर गर्व कर सकता है। पर क्या तुम सजीव व्यक्ति नही हो ! तुम्हारे प्रति उसका या तुम्हारा कोई कर्तव्य नही है। वह इस प्रश्न का बिना विचलित हुए एक आदर्श प्रेमिका के औदात्य का स्पर्श करते हुए स्पष्ट एवं अत्यंत दृढता के साथ उत्तर देते हुए कहती है – “तुम उनके प्रति अनुदार नही रही हो। माँ तुम जानती हो उनका जीवन परिस्थितियों की कैसी विडंवना में बीता है। मातुल के घर में उनकी क्या दशा रही है। इस साधनहीन एवं अभावग्रस्त जीवन में विवाह की कल्पना भी कैसे की जा सकती है। माँ आज तक का जीवन किसी तरह बीता ही है, आगे का भी बीत ही जाएगा। आज जब उनका जीवन नई दिशा ग्रहण कर रहा है, मैं उनके सामने अपने स्वार्थ की घोषणा नही करना चाहती। निश्चय ही उसका यह कथन उसके उदात्त व्यक्तित्व का द्योतक है जो कि प्रेम की शुचिता, उसकी पवित्रता एवं उत्सर्ग का संसर्ग उसे स्वर्णिमता प्रदान करता है।

इस उपन्यास का नायक कालिदास राजाश्रय पाने एवं मल्लिका के प्रेम के प्रति अपने को विरक्त पाने की स्थित में नही जान पड़ता है। वह सम्मान पाने के लिए उज्जयिनी जाने को मना करता है, मल्लिका बार- बार उससे उज्जयिनी जाने की जिद करती है जिससे उसकी प्रतिभा का सही - सही मूल्यांकन हो सके, वह जो अधूरा रह गया है उसके पूर्णत्व के लिए। कालिदास मल्लिका को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहता है  फिर एक बार सोच मल्लिका। प्रश्न सम्मान और राजाश्रय पाने का नही है। इससे कहीं बड़ा प्रश्न मेरे सामने है। मल्लिका कालिदास के चिंतातुर हृदय को अवलंब प्रदान करते हुए अपने भावों को उत्कट शब्दों में व्यक्त करते हुए कहती है  और वह प्रश्न मैं हूं .. हूं न ! तुम समझते हो कि तुम अवसर को ठुकराकर यहां रह जाओगे, तो मुझे सुख होगा ! मैं जानती हूं कि तुम्हारे चले जाने से मेरे अंतर को एक रिक्तता छा लेगी। बाहर भी संभवत:बहुत सूना प्रतीत होगा फिर भी मैं अपने साथ छल नही कर रही। मैं हृदय से कहती हूं तुम्हे जाना चाहिए। मेरी आँखें इसीलिए गीली हैं कि तुम मेरी बात नही समझ रहे हो। तुम यहां से जाकर भी मुझसे दूर नही हो सकते हो ! यहाँ ग्राम प्रांतर में रहकर तुम्हारी प्रतिभा को विकसित होने का अवसर कहां मिलेगा ! यहां लोग तुम्हे समझ नही पाते। वे सामान्य की कसौटी पर तुम्हारी परीक्षा करना चाहते हैं। विश्वास करते हो न कि मैं तुम्हे जानती हूं ! जानती हूं कि कोई भी रेखा तुम्हे घेर ले तो तुम घिर जाओगे। मैं तुम्हे घेरना नही चाहती हूं इसलिए कहती हूं जाओ। इस भूमि से जो तुम ग्रहण कर सकते थे कर चुके हो, तुम्हे आज नई भूमि की आवश्यता है जो तुम्हारे व्यक्तित्व को अधिक पूर्ण बना दे।

मल्लिका के इस आश्वासन से प्रभावित होकर कालिदास चला जाता है, लेकिन वियोग का प्रभाव हर संवेदनशील दृदय को झकझोर देता है। ऐसा ही कुछ मल्लिका के साथ भी हुआ। कालिदास के चले जाने के पर रोती हुई मल्लिका को आश्वासन देते हुए अंबिका कहती है -रोओ मत मल्लिका, तब मल्लिका का कथन उसके उदात्त व्यक्तित्व को उजागर करता है। - मैं रो नही रही हूं माँ ! मेरी आँखों में जो बरस रहा है वह दुख नही है। यह सुख है माँ, सुख।

कालिदास को उज्जयिनी भेजने में निक्षेप अपने आपको दोषी मानते हुए सोचता हुआ पश्चाताप की अग्नि में जलता है। वह अपने आप को मल्लिका का अपराधी मानते हुए कहता है  कई बार लगता है दोष मेरा है। मेंने आशा ही नही की थी कि उज्जयिनी जाकर कालिदास वहीं के होकर रह जाएंगे। सुना यह भी था कि गुप्तवंश की दुहिता से उनका विवाह हो गया । मल्लिका बिना विचलित हुए बहुत ही दृढ़ता से उत्तर देते हुए कहती है - “तो इसमें बुरा क्या है !” उसके प्रसंग में मेरी बात कहीं भी नही ठहरती। मैं अनेकानेक व्यक्तियों में से हूं। उन्हे अपने जीवन में असाधारण का ही साथ होना चाहिए था। सुना है राजदुहिता बहुत विदुषी है। इसके विपरीत मुझे अपने से ग्लानि होती है कि यह ऐसी मैं, उनकी प्रगति में बाधा भी बन सकती थी। आपके कहने से उन्हे जाने के लिए प्रेरित करती तो कितनी बड़ी क्षति होती।

कालिदास फिर लौट आते हैं। उनके साथ उसका सामीप्य बोध एवं कथोपकथन बहुत ही संवेदनशील हो उठता है । कालिदास को संबोधित करते हुए कहती है – “आज वर्षों बाद तुम लौट आए हो। सोचती थी तुम आओगे तो उसी प्रकार मेघ घिरे होंगे, वैसा ही अंधेरा सा दिन होगा, वैसे ही एक बार वर्षा में भींगूगी और तुमसे कहूंगी कि देखो मैंने तुम्हारी सब रचनाएं पढी हैं।  उज्जयनी  की ओर जाने वाले व्यवसायियों से कितना-कितना कहकर मैंने तुम्हारी रचनाएं मंगवाई है। सोचती थी तुम्हे मेघदूत की पक्तियां गा-गाकर सुनाऊंगी और यह भेंट तुम्हारे हाथों में रख दूंगी और कहूंगी कि देखो ये तुम्हारी नई रचना के लिए ये कोरे पृष्ठ मैंने अपने हाथों से बनाकर सिए हैं, इन पर जब भी तुम लिखोगे, उसमें अनुभव होगा कि मैं भी कहीं हूं, मेरा भी कुछ है। परंतु आज तुम आए हो तो सारा वातावरण ही और है और नही सोच पा रही हूं कि तुम वही हो या कोई दूसरा। कालिदास से फिर कहती है  मैंने अपने भाव कोष्ट को रिक्त नही होने दिया परंतु मेरे अभाव की पीड़ा का अनुमान लगा सकते हो। तुमने लिखा था कि एक दोष गुणों के समूह  में भी उसी तरह छिप जाता है, जैसे चांद की किरणों में कलंक परंतु दारिद्रय नही छिपता। सौ-सौ गुणों में भी नही छिपता। नही छिपता ही नही, सौ-सौ गुणों को छा लेता है  एक-एक को नष्ट कर देता है, परंतु मैंने यह सब सह लिया इसीलिए कि मैं टूटकर भी अनुभव करती रही कि तुम बन रहे हो क्योंकि मैं अपने को अपने में देखकर तुममें देखती थी और आज मैं यह सुन रही हूं कि तुम संन्यास ले रहे हो।
यह नाटक कवि कालिदास के जीवन पर आधरित है लेकिन कालिदास के कवि रूप में प्रसिद्ध होने के बाद उतना नही है जितना एक बनते हुए कवि और फिर प्रसिद्धि के चरम शिखर पर पहुंचने वाले कवि का है। मल्लिका के समक्ष कालिदास की स्वीकारोक्ति कि अभिज्ञान शाकुन्तलम में शकुन्तला के रूप में तुम्ही मेरे सामने थी। मैंने जब-जब लिखने का प्रयास किया तुम्हारे और अपने जीवन के इतिहास को फिर-फिर दोहराया और जब उससे अलग होकर लिखना चाहा तो रचना प्राणवान न हुई, उसके असीम प्रेम को दर्शाने में सहायक सिद्ध हुआ है।

नोट:- संगीत नाटक अकादमी द्वारा 1959 में पुरस्कृत किया गया तथा फिल्मफेयर पुरस्कार से भी विभूषित किया गया। अंत में आप सबका ध्यान इस तथ्य की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा कि इस उपन्यास की अंतर्वस्तु कालिदास के जीवन पर केंद्रित जो 100 ईस्वी पू. से 500 ईस्वी के अनुमानित काल में व्यतीत हुआ था  इनके द्वारा रचित दो नाटक आधे अधूरे एवं लहरों के राजहंस भी काफी ख्याति प्राप्त कर चुकें हैं।

(पोस्ट कुछ लंबा हो गया है, आशा करता हूं कि सुधी मित्रगण इसे अन्यथा न लेंगे। धन्यवाद।)