Friday, May 4, 2012

कहते हैं, तारे गाते हैं



कहते हैं, तारे गाते हैं


  (हरिवंश राय बच्चन)

प्रस्तुतकर्ता : प्रेम सागर सिंह


कहते हैं, तारे गाते हैं ।
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैँ ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

ऊपर देव, तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।


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21 comments:

  1. bahut sunder..aabhar aapka jo ye utkrisht rachna ham tak pahunchayi.

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  2. बहुत सुंदर सार्थक प्रयास // बेहतरीन रचना को हम तक पहुचाने का //


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  3. बच्चन जी की कवितायें अनमोल हैं ..
    धन्यवाद !

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  4. इस अनमोल खूबसूरत रचना के लिए आभार आपका...

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  5. अनुपम रचना...सुन्दर प्रस्तुति!

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  6. बच्चन की सुन्दर रचना |
    प्रेम सरोवर में पा जाता |
    तन मन को शीतल कर देती -
    सस्वर पाठ करके हर्साता ||

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  7. बच्चब जी की बेहतरीन रचना पढ़वाने के लिए आभार!

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  8. एक उत्कृष्ट रचना पढवाने के लिये आभार....

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  9. धन्यवाद शिवम मिश्रा जी ।

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  10. bachchan ji ki rachnaaye padhwane ke liye apka bahut bahut abhar..

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  11. आपकी यह बच्चन रचानावली बहुत सी पहले पढ़ी रचनाओं से साक्षात्कार का अवसर प्रदान कर रही है!! आभार प्रेम बाबू!!

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  12. "अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैँ ।"
    वाह ! बच्चन जी को नमन और आपका धन्यवाद।

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  13. राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं ।
    कहते हैं, तारे गाते हैं ।

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  14. बेहतरीन रचना पढ़कर अच्छा लगा..

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  15. वाह ... बहुत ही मनमोहक रचना ... लाजवाब गीत है बच्चन जी का ...

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