Monday, November 17, 2014

INDELIBLE MEMORY OF LOVE


Tease of feeling

PREM SAGAR SINGH


It would have been quite better,
Had your company been hidden,
Like roses between the pages of the book.
It gives sweet fragrance,
Sometimes says something
Sometimes starts teasing
You get yourself entwined
With the twist of the pages
And O, my femme fatal
I felt your presence
Just By touching
You by  my hand.
Embracing you in my arms
Retire to bed with tickling feelings,
To  stare at your juvenescence.
What a peaceful night,
That would have been!
Really true and one of its kind
Love reads and by saying love
I spent my whole life
With the twist of the  pages of book.
Immense love exists
in our fascinating  world of love,
Neither  you remained afraid
To be away from me
Nor i would have pain of your separation.
I  and you always remain afresh like rose

In the indelible memory of our love.

Saturday, October 11, 2014

प्रेम का स्वप्निल गणित

प्रेम का स्वप्निल गणित


प्रेम सागर सिंह

अपने गांव के,
इकलौते सरोवर के किनारे
जब तुम मेरा नाम लेकर,
फेंकती थी कंकण,
पानी की हिलोंरों के संग,
तब,
डूब जाया करता था मैं,
बहुत गहरे तक.....
सहेज कर रखे मेरे खतों का,
मेरे अहसासों का,
हिसाब किताब करते समय,
कहते थे,
तुम्हारी तरह
चंदन से महकते हैं,
तुम्हारे शब्द ...
आज जब,
यथार्थ की जमीन पर,
सोच की मुद्रा में बैठता हूं तो,
शून्य में,
लापता हो जाते हैं सारे अहसास,
सारी संवेदनाए,
क्योंकि ...
प्रेम के गणित में,
बहुत कमजोर थे हम दोनों।


Thursday, October 2, 2014

राही मासूम रजा

लेकिन मेरा लावारिस दिल

राही मासूम रजा

हिन्दी - उर्दू साहित्य के सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ राही मासूम रजा  का जन्म 1 सितम्बर 1927 ,को गाजीपुर (उत्तर प्रदेश ) के गंगोली गाँव में हुआ था। राही की प्रारंभिक शिक्षा गाजीपुर शहर में हुई।  इंटरकरने के बाद ये अलीगढ आ गए और यही से इन्होने उर्दू साहित्य में एम .ए.करने के बाद " तिलिस्म- -होशरुबा " पर पी.एच .डी.की डिग्री प्राप्त की । "तिलिस्म -ए -होशरुबा" उन कहानियो  का संग्रह है जिन्हें घर की नानी-दादी ,छोटे बच्चो को सुनाती है । पी .एच.डी करने के बाद ,ये  विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य के अध्यापक हो गए । अलीगढ में रहते हुए इन्होने अपने प्रसिद्ध उपन्यास " आधा-गाँव "की रचना की ,जोकि भारतीय साहित्य के इतिहास का एक मील का पत्थर साबित हुई। उन्हें रोज़गार के लिए फ़िल्म लेखन का काम शुरू किया। इसके लिए इन्हे कई बार बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा । लेकिन इन्होने बड़ी सफलतापूर्बक सबका निर्वाह किया फ़िल्म लेखन के साथ-साथ ये साहित्य रचना भी करते रहे । इन्होने जीवन को बड़े नजदीक से देखा और उसे साहित्य का विषय बनाया। इनके पात्र साधारण जीवन के होते और जीवन की समस्यों से जूझते हुए बड़ी जीवटता का परिचय देते है । इन्होने हिंदू -मुस्लिम संबंधो और बम्बई के फिल्मी जीवन को अपने साहित्य का विषय बनाया। इनके लिए भारतीयता आदमियत का पर्याय थी । इन्होने उर्दू साहित्य को देवनागरी लिपि में लिखने की शुरुआत की और जीवन पर्यंत इसी तरह साहित्य के सेवा करते रहे और इस तरह वे आम-आदमी के अपने सिपाही बने रहे । इस कलम के सिपाही का देहांत 15मार्च 1972 को हुआ। आईए, डालते हैं एक नजर उनकी एक कविता लेकिन मेरा लावारिस दिल   पर जो उनके विचारों को एक नया आयाम देती हैं ।


लेकिन मेरा लावारिस दिल  
:
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी 
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब 
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला 
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बंदा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आँसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
जगह जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी 
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
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Sunday, September 21, 2014

एहसास की चुभन

एहसास की चुभन
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तुम्हारा  साथ भी 
गुलाबों की तरह 
किताबों में दबाया 
जा सकता तो कितना 
अच्छा होता ......
हल्का-हल्का 
महकता 
कभी कभी कुछ कहता 
थोडा थोडा सा चुभता
तुम बंध जाती इन 
किताबों की सलवटों में 
और मैं तुम्हें 
हाथों से महसूस करता 
छूता.....चूमता और 
सीने लगा कर सो जाता
बहुत सुकूं भरी रातें होती 
वो सच .....
मोहब्बत 
पढ़ती और 
मोहब्बत कहते हुए 
किताब के उस मोड़ संग 
अपना जीवन गुजार देता
कितना 
प्रेम होता हमारे 
जहां में 
न तुम्हें मुझसे 
दूर जाने का डर होता 
न मुझे तुम्हारी 
जुदाई का गम

तुम और मैं 
गुलाब से रहते 
सदा जवां-जवां 
अपने प्यार की यादों में ........