प्रेम का स्वप्निल
गणित
प्रेम सागर सिंह
अपने गांव के,
इकलौते सरोवर के
किनारे
जब तुम मेरा नाम
लेकर,
फेंकती थी कंकण,
पानी की हिलोंरों के
संग,
तब,
डूब जाया करता था
मैं,
बहुत गहरे तक.....
सहेज कर रखे मेरे
खतों का,
मेरे अहसासों का,
हिसाब किताब करते
समय,
कहते थे,
तुम्हारी तरह
चंदन से महकते हैं,
तुम्हारे शब्द ...
आज जब,
यथार्थ की जमीन पर,
सोच की मुद्रा में
बैठता हूं तो,
शून्य में,
लापता हो जाते हैं
सारे अहसास,
सारी संवेदनाए,
क्योंकि ...
प्रेम के गणित में,
बहुत कमजोर थे हम
दोनों।
