Thursday, July 10, 2014

अंतस की पीड़ा


अंतस की पीड़ा

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      (प्रेम सागर सिंह)

" अनजाने ही मन न जाने क्यूं अतीत मेंं फिसल जाता है,
 फिर अचानक वर्तमान में संगी बनकर मन को बहला जाता है।
जाने क्यो हसना मुझे अब गुनाह सा नजर आता है,
नदी की चादर पर नाचता हर बिँदू खोखला सा इठलाता है।
साँझ के धुँधलके में हवा का कोई झोंका मदमाता है,
तो मेरे अँतर मे बहुत कुछ हल्का सा दरक जाता है।
हर दरार को हर बार मै कागज़ से ढाँक लेता हूँ,
दे देता हूँ उस दरार को  सीवन,  विकल्पो की
पर यादो का परीँदा केवल
एक फड़फड़ाहट मेँ ही
मेरा सारा सीवन उधेड़ जाता है।
इसी मशक्कत मे घड़ी पहर बीत जाता है
और मेरे हाथ कुछ भी नही आता है।"
खाली हथेलियो से मुँह ढ़ाँपे
समय मौज मनाता है

और
मेरे अँतस का पतझर अशेष रीता जाता है 

अशेष रीता जाता है  ...अशेष रीता जाता है।"

Saturday, April 5, 2014

मन का उच्छवास


      स्मृतियों की गवाही में    

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 (प्रेम सागर सिंह)

यहां हर  दिन हर पल मैं
गुनाह होते देख रहा हूं।
मजबूरी यह है मेरे दोस्तों,
कि 
इस घटना की गवाही देना,
मेरे लिए मुमकिन नहीं।
फिर भी इसे मन में सहेज रखता हूं,
ऐसा न हो कि शायद किसी दिन,
मुझे गवाह के रूप में,
कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।

जाने कब जमाने की हरकतें,
तकदीर की लकीरों पर कुछ लिख कर,
मेरे सिद्धांतों को बहका जाए,
मेरे सही कदमो को गलत दिशा ना मिले, 
इसलिए संभल कर चलना,
मेरी आदत सी बन गई है !
अब तो राहों में मूक मुसाफिर बनकर,
अपने छोड़े पदचिन्हों पर चलते जाना ही,
मेरी नियत सी बन गई है।

चलते-चलते कितने शब्द कहाँ लिख डाले,
स्मृति-मंजूषा में कुछ तो संचित रहे,
पर कुछेक को जमाने की चाहत को,
देखते हुए भूल जाने पर मजबूर हुआ।
जो याद रहा वो पास रहा,
जो भूल गया सो भूल गया,
पर कुछ को सहेज यहाँ तक लाया,
जिसने मन को काफी बहलाया।

दिन के उजियारे में,
जब आकाश उतर आता है,
मन न जाने क्यूं धूप के दूर कोने में,
खुशियों का दामन पकड़ कर,
अतीत में खोने लगता है।

स्मृतियों की गवाही में,
अजनबी सायों के चेहरे,
अब मायूस से कर जाते हैं
अब डर सा लगता है, कहीं,
इनमें से कोई मेरा हमसफर,
न मिल जाए।

यादों के अतल में,
कई चेहरे गुम से हो जाते हैं
कुछ तो याद रहते हैं,
और कुछ विस्मृत से हो जाते हैं,
खामोश मन में भूली बिसरी,
यादों का ऊभर आना,
अब इस ढलती वय में,
कुछ परेशान सा कर जाता है,
कुछ भाव मन को दोलायमान करते है,
तो कुछ सितारों- जड़ित करके,
मन में सहसा फिसल जाते हैं।
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Tuesday, March 4, 2014

SUBLIMATION OF THOUGHT


Dreams also have life.


THIS IS THE TRANSLATED VERSION OF MY HINDI POEM (समय की भी उम्र होती है) THIS POEM HAS ALREADY BEEN POSTED ON BLOG AND 29 OF MY BLOGGER FRIENDS HAVE ENCOURAGED ME BY GIVING THEIR VALUABLE COMMENTS.
(समय की भी उम्र होती है)
 
                                          (Prem Sagar Singh


 Today, the ocean of my heart,
 Is quiet and static,
The anger and commotion also Seems
To have ceased in my mindset.
Means ---
I have fully become an ocean,
Now -Just now.

I sat on the very memory stone,
Where, long long ago,
I used to engrave the dream of my future,
But –
The pieces of those stone.
Are nowhere seems to be visible,
Perhaps –
Dreams also have life.

While peeping into the past at this stage,
Many questions take birth in my heart,
And a sweet pain just starts teasing,
And Compromising with this,
has become my nature and ritual.

At the end of the day, evening starts,
Remembering all the optimistic thought of my life,
In a totally disappointed mood,
When I behold the horizon,
The color of my Kavita looks blooming,
And I sink in the ocean of imagination,
At this stage my Kavita comes there
and wipes the swet of my head.

It seems –
The expectation of arrival of morning,
After evening,
Starts melting gradually and mingles.
In the ocean of my mind,
Such emotional outburst teases to some extent,
And, in the expectation of wee hours of morning,
I feel. I ponder –
That the existence of Kavita in the light of sun,
Will act as a boost to my tired mind,
And make my imagination tangible.

I, alone, myself
Silently whispering the sigh of my imagination,
And after regaining the energy,
 I saw  that –
My Kavita was getting woven,
Flowing swiftly without any hurdle
With the speed of the fathomless water,

My compulsion was beyond description,
And at that particular time..
I was not so strong enough to save her,
From the clutches of insensitive people
Because the height of my longing,
Was of negligible magnitude,
In comparison with others.

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Thursday, February 6, 2014

एक टुकड़ा अडोल मन

                     सपनों की भी उम्र होती है         
                         
                              
                                                                      ( प्रेम सागर सिंह)
               
 आज मेरे मन का समुद्र,
बहुत शांत और अडोल है-
मेरे भीतर का आक्रोश और शोर भी,
बिल्कुल थम सा गया है-
यानि,
मैं मुकम्मल समुद्र हो गया हूँ,
अभी - इस वक्त।

मैं उन संगमर्मरी पत्थरों पे,
बैठ तो गया हूँ -
जिन पे बैठ कर मैं,
भविष्य के सपने तराशा करता था
पर,
मुझे उन सपनों के
तराशे हुये कतरे,
कहीं नहीं दिख रहे
इसे देख कर महसूस हो रहा है,
शायद,
सपनों की भी उम्र होती है।
इस वय में सपनों को निहारता हूं,
तो कई सवाल जहन में उतर जाते हैं,
और उतर जाता है एक मीठा सा दर्द,
जिसे अब चुपचाप सहते रहना,
मेरी नीयत सी बन गई है।
दिन उतरते ही सुहानी शाम उतर आती है,
नैराश्य भाव से उजाले को याद करते-करते,
जब मेरी निगाहें आकाश की ओर उठती हैं,
तब कविता का रंग खिलता नजर आता है,
डूब जाता है मन अतीत के समुद्र में,
और कविता मेरे माथे का पसीना पोछ देती है।
 ऐसा लगता है
साँझ के बाद सुबह आने की उम्मीद,
पिघल कर मन के समुद्र में,
धीरे-धीरे घुलती सी जा रही है.
कुछ देर तक यह एहसास सालता रहता है
और-
फिर अहले सुबह की उम्मीद में,
कि
सूरज की लालिमा में कविता का वजूद,
थके मन को सहारा देगा,
और मेरी कल्पना को प्राणवान करेगा।

बस – अकेले ही, मन ही मन
यूँ ही मैं गुनगुना रहा था,
और....
मेरी कविता बुनती जा रही थी,
बहती जा रही थी,
मझदार में फंसती जा रही थी
मेरी मजबूरी सिर्फ यह थी
कि
उस समय चाह कर भी मैं,
अपनी कविता को
बचा पाने में काफी कमजोर था,
क्योंकि जमाने की अनगिनत चाहतों के सामने,
मेरी चाहत की कद कुछ छोटी पड़ गई थी।

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Saturday, December 14, 2013

मेरा अतीत एवं मेरा वर्तमान


अतीत से वर्तमान तक का सफर

                                       
                                    प्रस्तुतकर्ता :प्रेम सागर सिंह  
मैं मानता हूं कि समय के साथ अतीत को भुलाकर लोग आगे बढ सकते हैं लेकिन जीवन में सब कुछ भुलाया नहीं जा सकता। कुछ लमहेकुछ अवसर ऐसे होते हैं, जिनके साथ हम हमेशा जीना चाहते हैं। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसे लमहे एवं कुछ अवसर आएं हैंजिन्हे मैं आज तक कभी भी नहीं भुला पया बात सन 1984 की है। जब मैं सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज में विधि स्नातक के कोर्स में दाखिला लिया था। दाखिला मिलने के बाद मैं अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों से यह कहते हुए अपने आपको बड़ा ही गर्वित महसूस करता था कि बाबू राजेंद्र प्रसाद (भूतपूर्व राष्ट्रपति) भी इसी कालेज से ला (LL.B) की परीक्षा पास किए थे। उन दिनों मैं भारतीय वायु सेना में कार्यरत था। एक तो फौज की नौकरी और ऊपर से पढ़ाई का बोझ मुझे नीरस करता गया। मैं अपने रिश्तेदारों एवं फौजी भाईयों के बीच चर्चा का विषय बनता गया और इस चर्चाकटाक्ष एवं उपहास ने मुझे कितना एकाग्रचित और गंभीर बना दिया था। इसे आज मैं उम्र की इस दहलीज पर पहुंच कर सोचता हूं तो मन सिहर सा जाता है। उन दिनों की यादें जीवन के हर एक पल में आज भी उसी तरह रची बसी हैं, जैसे पहले थीं। देखते-देखते समय कब गुजर गया पता ही नही चला। मैं भारतीय वायु सेना से रिटायर्ड होकर कोलकाता चला आया। यहां हमारा पुस्तैनी मकान है जिसमे हम चार भाई उस समय साथ ही रहते थे एवं उनमें से मै सबसे छोटा था।
विधि की विडंबना भी अजीब होती है। मेरे सामने अब तीन बच्चों का भविष्य नजर आने लगा। कोलकाता जैसे महानगर में 15 साल बाद आने पर कुछ अजीब सा लगने लगा। मेरे कल्पना के अनुरूप परिस्थितियां विपरीत निकली। दोस्त,सगे संबंधी सब बदले-बदले से नजर आने लगे। लेकिन मैं हतोत्साहित नही हुआ एवं कुछ कर गुजरने का भाव मन में अहर्निश कौंधने लगा। इस विचार ने मुझे समुद्र में खोए हुए नाविक की भांति किनारे की तलाश के लिए बेचैन कर दिया। लोवर कोर्ट,बैंकशाल कोर्ट एवं हाई कोर्ट तक का सफर एक वकील के रूप में करीब चार वर्ष तक तय करता रहा लेकिन जैसा चाहा था वैसा नही हुआ। एक बार मुझे महसूस हुआ कि मेरा शोषण किया जा रहा है लेकिन इस बात को मैंने किसी से भी शेयर नही किया। मैंने अनुभव किया कि इस पेशे में आने में बहुत देर हो गयी है। मेरी हालत सांप और छुछूदंदर जैसी हो गयी थी।
निराशा और अवसाद के इन दिनों में मैं अधीर सा हो गया था। मन ही मन इस पेशे से अलग होकर किसी दूसरे काम की तलाश करने लगा। कहते है  भाग्य भी बहादुर इंसान का साथ देता है। वही मेरे साथ भी हुआ। इंसपेक्टर ऑफ इनकम टैक्स से लेकरएयर इंडिया एवं इंडियन एयरलाइंस की लिखित एवं मौखिक परीक्षाएं भी पास करते गया। लेकिन विधाता ने इन नौकरियों को शायद मेरे भाग्य में नही लिखा था। कहते हैं- भाग्य में जो लिखा होता है,वही मिलता है।“ मुझे भी विधाता ने वही दिया जो मेरे भाग्य में लिखा था यानि कोलकाता स्थित भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय में (आयुध निर्माणी बोर्ड,कोलकाता) हिंदी अनुवादक का पदजिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर इस ढलती वय में प्रभु के आशीर्वाद के रूप में ग्रहण किया। यहां से मैंने अपने जीवन को नए सिरे से जीना शुरू किया लेकिन यह सोचकर मन कभी-कभी संत्रस्त हो जाता है कि यह सफर 31 मार्च, 2015 को शेष हो जाएगा। इतना कुछ सोचने के बाद भी आशान्वित रहता हूं कि मेरी कुंडली में तीसरी सरकरी नौकरी लिखा है। काशऐसा संभव हो पाता।
बाबूघाट वाले ऑफिस से घर लोटते वक्त जब भी बस से सियालदह स्टेशन पार करता हूं, मेरी यादें मुझे बहुत पीछे की ओर खींच ले जाती हैं क्योंकि दाएं स्टेशन एवं बाएं मेरा सुरेंद्र नाथ सांध्य ला कॉलेज दिखता है। यहां पहुचते ही मेरा मन न जाने क्यूं उस अतीत से अनायास ही जुड़ जाता है जो कभी मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहा है । उन दिनों मै बहुत खोया लेकिन उससे अधिक पाया भी। कॉलेज के उन दिनों में मैं अपने दोस्तों के साथ-साथ निकटवर्ती बाजारों में कभीकभी घूमने जाया करता था। शायद गर्मियों का दिन रहता था एवं कुछेक को स्टेशन तक भी छोड़ने जाता था।
 सियालदह ओवरब्रिज पर ट्राफिक जाम के कारण जब आस-पास नजर दौड़ाता था तो गुजरे 28 वर्षों पूर्व का दृश्य आँखों के सामने बरबस ही खींचा चला आता है। अठाईस वर्षों के बाद गर्मियों की इस शाम की शुरूआत में अपने शहर के पुराने चेहरे को याद करता हूं तो उसकी डूबती डबडबाती निगाहें सामने याद आती हैं । इन वर्षों में यह शहर भी बदला है। मैं भी बदला हूं एवं .शायद हम सबके रिश्ते भी बदल गए हैं।  इन बदलते परिस्थितियों में जब अपने आपको बीते वासर में ले जाता हू तो ऐसा लगता है कि बीते वर्षों में मेरे बचपन के परिचित इलाकों के मकान टूटे हैंपेड़ नष्ट हुए हैंगलियां गायब हुई हैंवे लोग नही रहे हैजीवन शैलियां नही रही है। न जाने उस दिन क्या हो गया था पता ही नही चला। तमाम कोशिशों के बावजूद भी अतीत की यादें पूर सफर के दौरान मेरा पीछा करती ऱही। कभी अतीत में खो जाता था तो कभी शहर की जिंदगी से जुड़ जाता था तो कभी सामाजिक राजनीतिक विषय मन में कौंधने लगते थे।
मैंने अनुभव किया कि किसी के भी जीवन में फिर कभी किसी शहर का ही जीवन क्यों न हो अठाईस बरस कम नही होते हैं। पर अब भी इस शहर में ऐसे कितने ही इलाकों में ऐसा कितना ही कुछ बचा हैजो मुझे मेरे बचपन के शहर का ही लगता है। जिससे मैं अपने शहर को भी महसूस करता हूं और अपने बचपन को भी। इस ओवरब्रिज से देखने पर सियालदह स्टेशन या निकटवर्ती बाजार का नजारा भी तो बदला है। क्या यह स्टेशन और बाजार उतना ही पुराना नही है ! कुछ बदलाओं को छोड़ कर। इन विगत वर्षों में देह ही नही शहर की आत्मा भी बदला है। सोचता हूंये सब साथ-साथ ही बदलते होंगे।पुरानी गलियां नही रही और उनसे गुजरते हुएउसमें बतियाते हुए लोग नही रहे। घर या किसी क्लब के करीब के चबूतरों पर बतियाते या खेलते हुए बूढ़े और बच्चे कम नजर आते हैं। लोगों की व्यवस्थाओं का स्वरूप भी बदला हैउनकी जीवन शैलियां और दृष्टियां भी बदली हैं। भोजपुरियन लोगों की भाषा में भी बदलाव आया है।  अब मेरे पड़ोस के बिहारी लोगों के अधिकांश घरों में लोग भोजपुरी की जगह खड़ी हिंदी का प्रयोग करते हैं। उनके बच्चे भी भोजपुरी भाषा भूलते जा रहे हैं। सोचता हूंइसमें उन मासूम बच्चों का क्या दोष है! कभी-कभी यह भी लगता है कि पिछले अठाईस वर्षों में समाज की जगह सिकुड़ी है,व्यक्ति की जगह फैली है पर यह फासला वैसा फासला नही है जिसकी मानवीय आकांक्षाओं को कभी गढ़ा गया था। पुरानी पीढ़ी के बीच ये फासले और भी कम हुए हैं। बूढ़ों और बच्चों के बीच का पुराना संवादसंबंध और सदभाव भी कम हुआ है। अन्यान्य कारणों से लोग अब अपना जितना समय सचमुच में परिवार के बीच बिताते हैंबिताना चाहते हैंउसमें गिरावट आई है। लगता है कि आदमी का अपने से भी संबंध कम होता गया है।    
 इसके बाद मेरी चिंतन धारा को एक नया आयाम मिला। अपने बारे मेंअपने परिवार के संबंध में जब सोचने लगा तब मन बड़ा ही विकल हो उठा एवं आंखे नम होने लगी। बड़े भैया का निधन (2009) उसके करीब एक साल बाद (2010) मां जैसा प्यार और दुलार तथा वटवृक्ष की तरह शीतल छाया प्रदान करने वाली बड़ी भाभी का गुजर जाना एवं (2011)  में मझले भाई की अप्रत्याशित निधन के कारण मेरे अपने घर की ही धारणा और प्रभा भी बिखरती गयी है। मेरे घर के साथ-साथ पुराने घरों में व्याप्त सक्रियताएंपारस्परिक संवाद और लगावों में भी बहुत कमी आई है। घर की अपनी जगह भी सिकुड़ती जा रही है। घर का अपना आत्म भी आहत हुआ है। क्या यह संभव हो सकता है कि आहत आत्म के घर में बसे हुए आदमी की अपनी आत्मा साबूतस्थित और तनावहीन बनी रहे। लेकिन मेरे बचपन की बस्ती में पास-पड़ोस में मनुष्य की जितनी आवाजें सुनाई पड़ती थी अब उतनी नही । उन दिनों में एक आदमी दूसरे आदमी कीएक घर दूसरे घर कीएक परिवार दूसरे परिवार की चिंताओं और व्यथाओं से कम से कम निम्न मध्यवर्गीय इलाकों में तो जुड़ा हुआ रहता ही था। इन दिनों टेलिविजन और इंटरनेट नही हुआ करते थे। इनमें से टेलिविजन ने एक किस्म के लगाव को जन्म दिया है तो एक प्रकार के अलगाव को भी।
राग और विराग भले ही विपरीत दिशाओं में रहें पर शायद चलते साथ-साथ हैं। अपनी निगाहों से घरोंपरिवारों में बढी हुई संवादहीनता को देखता हूं तब यह भी ख्याल आता है कि इस संवादहीनता के चलते या इसके कारण भी मानवीय सक्रियता का अभाव बढ़ता गया है। प्रतिरोध की राजनीति प्रभावित हुई है। परिवर्तन की आवाज सर्वत्र गुंजरित होने लगी है। सहयोगमानवीय संवेदनाओं एव पीड़ा में निरंतर ह्वास देखने को मिल रहा है। सहयोग के धर्म का स्खलन हुआ है। मैं सोचता हूं कि संवादसहयोग और सक्रियता के भी अपने अंतर्संबंध होते होंगे। ये तीनों जब अपना संतुलन बना पाते होंगे तब समाज में सुख का जन्म होता होगाशांति के दिनों में इतना विचारणीय और विवेकशील बना हुआ थावही समाज इन तनावपूर्ण और हिंसक दिनों में कैसे इतना विचारहीन हो जाता है ।
इन्ही विचारों में डूबता उतराता रहा एवं बस कंडक्टर की कर्कश आवाज ने मुझे अचंभित कर दिया। इसके आगे मैं कुछ सोच पाताउसकी आवाज इस बार काफी तेज थी। उसने बांगला भाषा में कहा दादा कोताय नामबेन ( ओ भाईकहां उतरिएगा)। बाहर झांक कर देखा तो मेरा बस स्टॉपेज आने वाला था। स्टॉपेज आने पर मैं बस से उतर तो गया लेकिन ऐसा लग रहा था कि बस के भीतर बैठे सभी यात्रियों की निगाहें मेरी ओर ही थी। पैदल चलते-चलते मन ही मन यही सोचता रहा कि अपने अतीत को, बीते दिनों के संघर्ष को कभी भुलाना नहीं चाहिए, लेकिन उसमें इतना भी नहीं खोना चाहिए कि वे यादें भविष्य के लिए बेडियों का काम करने लगें। भावनात्मक जुडाव तो होता है, लेकिन उससे निकलकर आगे भी तो बढना है। अतीत से जुडाव तो हमेशा ही रहता है, क्योंकि यह एक पेड की तरह है, जिसकी जडें हमेशा जमीन के अंदर होती हैं और जडें गहरी हैं- तभी पेड जिंदा है। अगर जडें ही मिट गई तो उसका अस्तित्व मिट जाता है। अब मैं अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गया हूंजहां हर चीज अपनी पूर्णावस्था में परिलक्षित होती है।

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