Friday, June 8, 2012

भारतीय नारी: पुरूषों के झूठे अहम की वलिवेदी पर चढ़ी बकरी है


भारतीय नारी  : पुरुषों के झूठे अहम की बलिवेदी पर चढ़ी बकरी है।

 
 (प्रस्तुतकर्ता: प्रेम सागर सिंह)


हिंदी के यशस्वी कवि श्री जयशंकर प्रसाद जी ने नारी के संबंध में कहा है

'नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पगतल में,
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में' .

      वास्तव में भारतीयों के लिए स्त्री पृथ्वी की कल्पलता है. भारतीय समाज में नारी पुरुषों के लिए तथा पुरुष नारी के लिए सर्वस्व त्याग करने के लिए तत्पर है. यही त्याग की भावना दोनों के जीवन को सुखमय बनती है. वह करुणा, दया, प्रेम आदि मानवीय गुणों की देवी है. वह समाज की मार्गादार्शिक भी है. वास्तव में भारतीय समाज में उसका स्थान अनुपम है. स्त्री के साथ भेद दृष्टि और लैंगिक असमानता के सैकड़ों संदर्भ समस्त धर्म, साहित्य और परम्परा में बिखरे पड़े हैं। कोई भी धार्मिक मान्यता इससे अछूता नहीं है। सम्प्रदाय मानसिकता में जीने वाली परम्पराएं मानव के रूप में स्त्री को प्रतिष्ठित नहीं कर पायी हैं।  अर्वाचीन काल में एक समय ऐसा भी आया था जब यह कह गया कि यत्र पूज्यस्ते नारी तत्र रमंते देवता एवं ठीक इसके बाद ही एक आवाज बुलंद हुई - नारी नरकस्य द्वार एकम । अत: हम भारतीय नारी के स्वरूप को विभिन्न रूपों में देखते हैं । वह कभी सीता, सावित्री, द्रौपदी, राधा या मीरा के रूप में सामने आई है तो कभी चंडी का भी रूप धारण किया है। वह शिव की पार्वती है या फिर विष्णु की लक्ष्मी।  सीता जो पति की खातिर चौदह साल तक बनवास भोगती है। सावित्री जो पति सत्यवान के जीवन के लिये यमराज से लड़ जाती है। द्रौपदी जो पांच महाबली पतियों के बावजूद दुशासन के चीर-हरण की शिकार होती है। राधा और मीरा कृष्ण के प्यार में दीवानी। पार्वती और लक्ष्मी देवियां हैं लेकिन उनकी पहचान शिव और विष्णु से है। यानी देवी हो या फिर आम स्त्री पति ही परमेश्वर है और पुरुष के बिना कुछ भी नहीं। वो गरीब है तो अबला और अमीर है तो इज्जत। इनके बीच वो क्या है?
सीता को पति चुनने का अधिकार दिया गया और द्रौपदी को भी जीतने के लिये अर्जुन को मछली की आंख मे तीर भेदना पड़ा। सावित्री भी अपने पिता की इच्छा के विपरीत गरीब सत्यवान का वरण करती है ये जानते हुये कि यमराज के बहीखाते में उनकी उम्र काफी कम है। तीनों तेजस्वी हैं और स्वतंत्र मस्तिष्क की स्वामिनी। लेकिन कहानी शादी के बाद खत्म होती प्रतीत होती है। सीता राम के साथ सहर्ष वनवास जाती है। क्योंकि यही एक पत्नी का धर्म है और पति से अलग उसकी अपनी कोई दुनिया नहीं है ये रामायण कहती है। अपहरण के बाद उन्हें अशोक वाटिका में दिन गुजारने पड़े। ये वो वक्त था जब राम भी अकेले थे और सीता भी लेकिन युद्ध के बाद जब सीता और राम का मिलन होता है तो एक धोबी की बात सुनकर राम सीता से अग्नि परीक्षा लेते हैं और सीता इसका बिना विरोध किये दे भी देती हैं। हालांकि बाद मे वो ये अपमान बर्दाश्त नहीं कर पातीं और धरती में समा जाती हैं। पर ये सवाल सीता नहीं उठातीं कि जो नियम सीता पर लागू होता है वही राम पर क्यों नहीं? राम भी तो सीता के बगैर रहे, उनके मन में भी तो किसी और स्त्री का स्मरण हो सकता है तो फिर वही अग्नि परीक्षा राम ने क्यों नहीं दी? और सीता इसकी मांग न कर क्यों धरती में समा गईं? सीता का किरदार दरअसल राम की मर्यादा को खंडित करता है। और उन्हें ईश्वर से इंसान बना देता है।
सावित्री का पूरा चरित्र ही इस तरह से गढ़ा गया है कि पति के बिना वो कुछ भी नहीं। यमराज से उनकी पूरी लड़ाई भारतीय नारी के लिये एक स्टीरियो टाइप बन गया और हर स्त्री के पत्नी होने की एकमात्र कसौटी। पत्नी की पवित्रता के लिये ये जरूरी हो गया कि वो सावित्री की तरह पति के प्रति समर्पित और एकनिष्ठ रहे और उसके अलावा कहीं अपने आप को न तलाशे। पति कैसा भी हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पत्नी को सती सावित्री ही होना चाहिए। सदियों से ये कहानी चली आ रही है और सदियों से वो ये परीक्षा दिए जा रही है। सावित्री भारतीय पुरुष को परमेश्वर बनाने की कहानी है। सड़ी गली परंपरा को दार्शनिक आधार देने का अजीबोगरीब तर्क।
द्रौपदी बनकर वो अपने आपको थोड़ा स्वतंत्र दिखाने की कोशिश जरूर करती है लेकिन वो कभी इस बात का विरोध नही करती है कि कुंती के कहने मात्र से ही वह पांचों पांडवों की पत्नी क्यों होगी? वह दरअसल हमारे पुरुष प्रधान समाज की नपुंसकता की प्रतीक है। वो उन नियमों की दासी है जो सामंतवादी समाज ने गढ़े। वो महाबलियों के बावजूद भी कमजोर है। पुरुषों के झूठे अहम की बलिवेदी पर चढ़ी बकरी है। जो आजाद होने का स्वांग भरती है और आखिर में उसका शिकार भी हो जाती है और जब उसका अपमान हो रहा होता है तो इंसान नहीं भगवान ही उसकी रक्षा करते हैं। यानी अगर चुनाव पुरुष के अहम और स्त्री के सतीत्व में होगा तो जीत सिर्फ पुरुष के अहम की ही होगी, भले ही उसका चीर हरण हो जाये।
राधा और मीरा को भले ही प्रेम का प्रतीक माना जाये लेकिन वो भी कृष्ण रूपी पुरुष मे अपनी पूर्णता को देखती हैं। वो कृष्ण के प्रेम में पागल हैं, कृष्ण उनके प्रेम में पागल नहीं हैं। कृष्ण के लिये प्रेम एक लीला है। लेकिन राधा और मीरा के लिये प्रेम जीवन का सार। हालांकि उन्हें एक खास सामाजिक पृष्ठभूमि में आप बागी भी कह सकते हैं लेकिन ये बगावत अपना स्वतंत्र अस्तित्व खोजने की कथा नहीं है, ये कृष्ण में विलीन हो जाने का फसाना है। पार्वती की चर्चा कभी भी शिव के बिना नहीं होती और लक्ष्मी का भी यही हाल है। दोनों ही देवों के देव शिव और विष्णु की अर्धांगनिय़ां हैं। सीता की तरह पार्वती भी भभूतधारी और औघड़रूपी शिव को पति के रूप मे चुनती हैं लेकिन इसके बाद वो भी गुम हो जाती हैं। इन तमाम बिंबों में शायद दुर्गा या काली ही अकेली हैं जिनको परिभाषित करने के लिये किसी पुरुष की जरूरत नहीं होती। वो आदि शक्ति हैं, आदि रूपा। पर ये हमारी भारतीय पंरपरा में अपवाद है। नियम नहीं। ऐसे में भारतीय संदर्भों मे जब भी स्त्री प्रतीकों की बात होगी तब काली या दुर्गा की नहीं सीता, द्रौपदी, सावित्री, पार्वती, लक्ष्मी राधा और मीरा की ही बात होगी। क्योंकि यहीं हमारे जनमानस की मुख्यधारा में व्याप्त हैं।
ये अद्भुत संयोग है या फिर हमारी परंपरा का दुहरा चरित्र कि सीता हो या सावित्री या फिर द्रौपदी या पार्वती सबको पुरुष चुनने का अधिकार तो दिया गया लेकिन चयन की प्रकिया पूरी होते ही सारे अधिकार छीन के पुरुषों को दे दिये गए। यानी स्त्री जाने अनजाने बराबरी के अधिकार को त्याग देती है। ये शायद उस देश काल की मजबूरी रही हो। या फिर पुरुषवादी मानसिकता का आघात कि आजाद स्त्री पुरुष की छाया बन जाती है। ये स्पष्ट है कि भारतीय परंपरा मे स्त्री कुछ भी है लेकिन वो पुरुष के बराबर नहीं है। और यही परंपरा आजाद हिंदुस्तान में भी बखूबी चली आ रही है। हम घरों में देवियों की पूजा करते हैं, लेकिन उसे बराबरी का दर्जा नहीं देते। दहेज हत्या हो या फिर भ्रूण हत्या ये इस गैर बराबरी और पुरुषवादी मानसिकता का ही रिफलेक्शन है। ये यही दुहरा चरित्र है कि बच्ची के पैदा होते ही स्त्री को अपशकुन करार दिया जाता है और स्त्री विवश हो कह उठती है अगले जन्म हमें बिटिया न कीजो। धर्म का अतीत तो हम बदल नहीं सकते और न ही उसकी मान्य़ताओं और प्रतीकों को लेकिन संविधान के जरिये सदियों से दबाई गई स्त्री को बराबरी का कुछ दर्जा जरूर दे सकते हैं। ऐसे में अगर महिला आरक्षण बिल आता है तो हमें खुलकर समर्थन करना चाहिए। ताकि हम पुरुष अपने किये पापों का कुछ तो प्रायश्चित कर सकें ................... ।

नोट: -- दोस्तों, इसके पूर्व भी मैं आप लोगों से निवेदन कर चुका हूं कि मैं अपने प्रत्येक पोस्ट में कुछ ऐसी बातों को आप सबके समक्ष प्रस्तुत करता रहा हूं ताकि मेरा पोस्ट सूचनाप्रद होने के साथ-साथ आपके दिल में भी थोड़ी सी जगह भी पा सके । मैं अपने प्रयास परिश्रम एव तथ्यों के चयन में कहां तक सफल रहा ये तो आप सबकी प्रतिक्रियाएं ही बता सकती हैं । अत: इसे रूचिकर एवं सूचनाप्रद बनाने के लिए आपके सहयोग की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद । आपका- प्रेम सागर सिंह
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Sunday, June 3, 2012

खड़ी बोली का प्रतिनिधि कवि : मैथिलीशरण गुप्त


खड़ी बोली का प्रतिनिधि कवि : मैथिलीशरण गुप्त

(खड़ी बोली कविता का बहुत बड़ा कविता इतिहास गुप्त जी की कृतियों का है। उन्होंने खड़ी बोली को उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, उसकी चिह्वा को शुद्द किया तथा उसके हृदय में प्रेम एवं मष्तिष्क में अभिनव विचारों का संचार किया । उनका उत्थान द्विवेदी-मंडल के सबसे बड़े प्रकाश स्तम्भ के रूप में हुआ जिसके दूरगामी प्रकाश में खड़ी बोली ने अपना गंतव्य दिशा का ध्यान एवं अपने आदर्श का अवलोकन किया)


मैथिलीशरण गुप्त


       प्रस्तुतकर्ता : प्रेम सागर सिंह


 भारतेंदु के बाद अब तक के कवियों में श्री मैथिलीशऱण गुप्त जी का स्थान निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ हैं। यद्यपि कि उनके प्रधान मनोवेगों का युग आज से लगभग कई वर्षों पूर्व ही समाप्त हो गया, तो भी कई कारणों से अब भी इस पद के अधिकारी वे ही हैं। शंका और संदेह के युग में उन्होंने  आस्तिकता की भारतीय परंपरा की वाणी को सुदृढ़ बनाया । साहित्य में वैष्ण्व धर्म को पुनरूज्जीवित किया, इतिहास को काव्य में रूपांतरित करके उसमें जीवन डाला, पराधीन देश को अपनी शक्ति की याद दिलाई और शुद्ध आर्य-संस्कृति जागृति को अधिक-से-अधिक व्यापक बनाने की चेष्टा की। इस प्रकार उन्होंने हिंदू जाति के सभी प्रिय भावों का व्यापक प्रतिनिधित्व किया है। कोई आश्चर्य नही कि आज हिदू जनता के दृदय पर उनका ऐसा साम्राज्य है जैसा बहुत दिनों से किसी अन्य कवि को प्राप्त नही हुआ था ।
1920 से बाद की धारा के सम्राट पंत जी हैं. किंतु इस सत्य को उदघोषित करना निरापद नही है ; क्योंकि प्रतिद्वंधिता निराला जी से है और जब प्रसाद जी जीवित थे तब विवाद की कटुता से बचने के लिए लोग इन दोनों कवियों के ऊपर उन्ही का नाम लिख देते थे । पंत और निराला हिंदी के ज्योर्तिनयन प्रियदर्शी कवि हैं  और दोनों ही का वर्तमान हिंदी कविता पर व्यापक प्रभाव है । हिंदी कविता के वर्तमान इतिहास को अबी यह सुविधा प्राप्त नही कि  वह इन दोनों कवियों की सेवाओं को तुला के दोनों आधारों पर तौल कर उन पर अलग-अलग मत दे सके ।
भारतेंदु के समय से ही हिंदी कविता में सामयिक प्रश्नों से उलझने की प्रवृति का जन्म हो रहा था, लेकिन इस दिशा में भी उसके स्वर को अधिक स्प्ट एवं सुदृढ़ बनाकर सुनाने का सारा श्रेय गुप्त जी को है, इतना ही नही, वरन निद्रा की जड़ता से राष्ट्र को जगाने के लिए जब साहित्य ने शँक फूकना आरंभ किया तब भी पाँचजन्य की भारतीमैथिलीशऱण गुप्त जी के कंठ से ही फूटी । आज हिंदी कविता में प्रगतिवाद का जयघोष गुंज रहा है, लेकिन हिंदी कविता को अपने सामाजिक लक्ष्यों का ध्यान बहुतों से पहले गुप्त जी ने ही दिलाया था ।
गुप्त जी प्राचीनता के संदेशवाहक नवीन कवि हैं। वर्तमान कविता के इतिहास में उनका इतिहास एक महासेतु की तरह है, जिसका आदि स्तंभ भारत-भारती है, यद्यपि उसमें झंकार, साकेत और यशोधरा के सुदृढ़ खंभे लगते ही आए हैं। गुप्त जी की एक बहुत बड़ी विशेषता यह भी है कि स्वयं काव्य रचने के साथ-साथ वह अपनी रचना के प्रभाव से समकालीन कवियों को भी नई भावनाओं की ओर प्रेरित करे । छायावाद-युग के समारंभ तक कविता के क्षेत्र में उनका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से काम करता रहा। उसके बाद यद्यपि नई धारा के कवियों ने उनसे प्रभाव ग्रहण नही किया तथा स्वयं ही  वे उस धारा के कवियों को आशीर्वाद देने के लिए चले आए, किंतु कौन कह सकता है कि झंकार की कविताओं से रहस्यवाद की रीढ़ मजबूत हुई !
स्वर न ताल, केवल झंकार, किसी शून्य में कर विहार, इस बात से यह ध्वनित होती है कि रचना के समय गुप्त जी की मनोदशा बहुत कुछ रोमांटिक कवि की मनोदशा के समान थी तथा वे इस बात से अवगत थे कि उनके हाथ में जो वीणा आई है उसके तार वर्णन नही, प्रत्युत व्यंजना की कला में पटु है । गुप्त जी की गोद में जाकर नई वीणा ने कुछ खोया नही, वरन् उसने यही प्रमाणित किया कि वह भाव, शैली तथा छंद,  सभी पर प्रचंड स्वामित्व रखने वाले महाप्रौढ़ कवि की भावनाओं की भी सुंदर तथा समर्थ व्यंजना कर सकती है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर उन्हे खड़ी बोली का प्रतिनिधि कवि कहने पर दो राय नही हो सकती है ।

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Thursday, May 31, 2012

बिहार की स्थापना का 100 वां वर्ष: क्या खोया, क्या पाया


 बिहार की स्थापना का 100 वां वर्ष : क्या खोया,क्या पाया !


                          
                         
                  प्रस्तुतकर्ता: (प्रेम सागर सिंह)


जिंदगी के इंद्रधनुषी रंगों की तरह बिहार राज्य का रंग भी बेशुमार है। बिहारवासियों के लिए इसे जिंदगी को जितने भी रंग में जिया जा सकता है, बिहार को उससे कहीं ज्यादा रंगों में कहा जा सकता है । इसका चोला कुछ इस अंदाज का है कि जिंदगी का बदलता हुआ हर रंग उस पर सजने लगता है और उसकी फबन में चार चाँद लगा देता है, इसीलिए सदियों के लंबे सफर के बावजूद बिहार की माटी, सभ्यता, संस्कृति, त्यौहार एवं इतिहास आज भी ताजा दम है, हसीन है, और दिल नवाज भी

 यह हमारे लिए बड़े ही गर्व की बात है कि आज देश के कई शहरों में बिहार की स्थापना के 100 वें वर्ष के महोत्सव मनाये जा रहे हैं। इस महोत्सव के खैर अपने राजनीतिक मायने और महत्व हैं। शायद यही कारण है कि दूसरे राज्यों में बिहार के प्रवासी लोगों के साथ-साथ राज्य के स्कूल-कालेज-विश्वविद्यालयों में भी इस समारोह की गूंज सुनाई पड़ी है। विगत 30 वर्षों में तो बिहार भ्रष्ट राजनीति, आर्थिक पिछड़ेपन एवं अपराधिक गतिविधियों की अनियंत्रित वृद्धि के कारण सभी जगह आलोचना का विषय भी बना। अपने गौरवमयी अतीत एवं संघर्षों से भरे वर्तमान के मध्य झूलता बिहार फिर भी प्रगति के पथ पर है। बिहार की राजनीतिक दुरावस्था के कट्टर आलोचक भी यह अब मानने लगे हैं कि वहां के क्षितिज पर आशावाद की नवज्योति की रश्मियां फैलने लगी है।
 किसी भी घटना या परिवर्तन को दर्ज करना इतिहास की नियति है। इस संदर्भ में बिहार का इतिहास एवं सांस्कृतिक अस्तित्व तो भारतीय सभ्यता के उत्कर्ष एवं पाटलिपुत्र में भारतीय शासन के अभ्युदय से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। बिहारवासी शताब्दियों पूर्व के अपने क्षेत्रीय इतिहास से स्वयं को जोड़कर ही अपूर्व गौरव का अनुभव करता है। यदि आज की राजनीतिक परिचर्चा की परिधि से बाहर जाकर सोचा जाए तो बिहार की पृष्ठभूमि से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए वर्ष 1912 उसके बंगाल से पृथक होने का काल अवश्य है, पर यह उसके भू-सांस्कृतिक पहचान के निर्माण का वर्ष नहीं है। इस शताब्दी वर्ष में बिहार की सांस्कृतिक गरिमा एवं ऐतिहासिक महत्ता पर दृष्टिपात करना परमावश्यक है। नैमिषारण्य (वर्तमान सारण) एवं धर्मारण्य (गया) तपोभूमि के रूप में विख्यात रहे हैं। वैज्ञानिक साहित्य में जिस पाटलिपुत्र वासी आर्यभट्ट ने अपूर्व योग्यता का परिचय दिया, वह भारत ही नहीं, विश्व के लिए अद्वितीय उपलब्धि का विषय है। भारतीय वांग्मय के शिरोमणि कालिदास की जन्मभूमि भी लोकमान्यताओं के अनुसार मिथिला है।
 बिहार के ऐतिहासिक योगदान का सबसे प्रभावशाली पक्ष है छठी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी सदी अर्थात बारह सौ साल तक भारतीय राजनीति में अग्रगामी भूमिका का निर्वाह। इस कालखंड में बिहार ने केवल चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, पुष्यमित्र शुंग, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, कुमार गुप्त, स्कंदगुप्त जैसे यशस्वी शासक ही नहीं दिए, अपितु आसेतु हिमालयात् अर्थात समुद्र से हिमालय पर्यन्त शासन की स्थापना कर भविष्य के अखंड भारत का आधार भी निर्मित किया। ये बारह सौ साल भारतीय संस्कृति के पुष्पित पल्लवित होने का काल है। निश्चय ही इसका केंद्र पाटलिपुत्र था। इस बीच शक, पार्थियन, इण्डो-ग्रीक, हुण आदि आक्रमणों से भारतीय भूमि की रक्षा के दायित्व का भी सफल निर्वाह किया गया। इस संदर्भ में सेल्युकस के ऊपर चंद्रगुप्त मौर्य की विजय, समुद्रगुप्त द्वारा शक, मुरुंड एवं शाहानुशाहियों (कुषाणों) को उखाड़ फेंकना, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा शकों का निर्वासन तथा स्कंदगुप्त द्वारा विशाल हुण सेना पर विजय भारतीय सैन्य इतिहास की अविस्मरणीय घटनायें हैं।
 मध्यकालीन राजनीतिक उथल-पुथल के बीच घटने वाली अनेक घटनायें भी बिहार को गौरव प्रदान करती हैं। शेरशाह एवं हेमू विक्रमादित्य जैसे नायकों की सैन्य सफलतायें बिहार की ताकत के ही दृष्टान्त थे। महाराजा सुन्दर सिंह की अलीवर्दी खान (बंगाल के शासक) एवं मराठों के विरुद्ध सफलता के ऊपर भले ही किसी इतिहासकार की दृष्टि नहीं गई हो, पर आज भी वे मगध क्षेत्र में वीरता के प्रतीक पुरुष हैं, जिनके पटना से क्युल तक के सैन्य अभियान एवं कर्मनाशा के द्वार पर मराठों एवं मुगलों से लोहा लेने की शक्ति के कारण औरंगजेब की मृत्यु के बाद की स्थिति में बिहार के बड़े क्षेत्र को राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त हुई।
 बिहार इस काल में न केवल गांधी एवं नेहरू संचालित कांग्रेस के आंदोलन का केन्द्र था, बल्कि सुभाषचंद्र बोस की राजनीतिक सफलता के पीछे बिहार की वे 429 जनसभायें थीं, जिसमें वे सहजानंद सरस्वती के साथ थे। आधुनिक भारत के तीन बड़े आंदोलनकारियों सहजानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण, सभी को बिहार ने आधारभूत समर्थन प्रदान किया। इतना ही नहीं, बिहार का विप्लवी राष्ट्रवाद भी अविस्मरणीय है। वीर योगेन्द्र शुक्ल, बैकुण्ठ शुक्ल, किशोरी प्रसन्न सिंह एवं अक्षयवर राय जैसे नेता भला कैसे भुलाये जा सकते हैं। फांसी का बदला चुका कर फांसी पर झूलने का गौरव बिहार के बेटे बैकुण्ठ शुक्ल को है। बक्सर युद्ध के बाद कंपनी शासन को चुनौती देने के लिए हथुआ महाराज फतेहबहादुर शाही ने जो विद्रोह किया उसे 1857 में क्रांतिवीर आरा निवासी  वीर कुंवर सिंह और उसके उपरान्त अगस्त क्रांति के शहीदों (पटना के सात शहीद) ने जारी रखा।
 विगत वर्षों की उपलब्धियों की तुलना में आज बिहार विकासोन्मुखी नजर आने लगा है, पर विकास का सारा ताना-बाना सड़क एवं पुल निर्माण तक सीमित है। हां, एक उपलब्धि और मान लेनी चाहिए कि कुछ सामाजिक, शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं में ग्रामीण स्तर पर बेकार बैठे लोगों को अल्पकालिक ही सही, पर नौकरी का अवसर प्राप्त हुआ है। इनका गुणात्मक परिणाम क्या होगा? कहना कठिन है। प्रारंभिक शिक्षा की हालत तो बिहार में खराब ही है, उससे भी बदतर है उच्च शिक्षा एवं विश्वविद्यालयों की स्थिति। श्रमिकों के साथ-साथ विद्यार्थियों के अनवरत पलायन को रोकने में बिहार का वर्तमान प्रशासन कितना सक्षम होगा, यह अब भी एक यक्ष प्रश्न है। मुंबई में बिहार शताब्दी समारोह मना रहे मुख्यमंत्री की उद्योगपतियों से बैठक कुछ लोगों के लिए एक नयी आशा है। पर परिणाम तो लंबे काल के बाद दिखेगा। उत्तरी भाग बाढ़ ग्रस्त तो दक्षिणी भाग सूखा पीड़ित। इसके लिए कृषि नीति क्या हो? बिना विद्युत के उद्योग भला कैसे फले-फूले? ऐसे कितने ही प्रश्नों का उत्तर अब भी शेष है।
 सर गणेश दत्त नेइंस्टिट्यूट ऑफ बैक्टिरियोलाजी” (Institute Of Bacteriology) की स्थापना पटना मेडिकल अस्पताल में तब करवायी थी, जब विश्व के लिए यह नया विषय था। आज बिहार प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के अभाव से जूझ रहा है। मुजफ्फरपुर में आजादी के पहले भौतिकी एवं खगोलीय शोध के लिए विशाल प्लैनेटोरियम (तारामंडल) स्थापित किया गया था, पर आज बिहार के विश्वविद्यालय प्रमाणपत्र, अंक-पत्र एवं मानपत्र देने वाली संस्थायें मात्र बन कर रह गए हैं। इस शताब्दी वर्ष में इन सभी बिंदुओं पर समग्र चिंतन आवश्यक है।
 हमें प्रयास करना होगा कि वर्ष 2012 बिहार के विकास के संकल्प का वर्ष बने। बड़े शहरों यथा दिल्ली, मुंबई, कोलकाता , सूरत आदि के शताब्दी महोत्सव अपना लक्ष्य तभी हासिल कर पाएंगे, जब आगामी दशक में बिहार आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पुनर्निर्माण के अपने नवीन लक्ष्य को प्राप्त कर चुका होगा। आशा ही नही मेरा अटूट विश्वास है कि वर्तमान मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बिहार आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, सूचना प्रौद्योगिकी, कला एवं विज्ञान के क्षेत्र में अहर्निश प्रगति के पथ पर अग्रसरित होता रहेगा ।                     
                
                   जय बिहार ।

नोट:- अपने किसी भी पोस्ट की पृष्ठभूमि में मेरा यह प्रयास रहता है कि इस मंच से सूचनापरक साहित्य एवं संकलित तथ्यों को आप सबके समक्ष  सटीक रूप में प्रस्तुत करता रहूं किंतु मैं अपने प्रयास एवं परिश्रम में कहां तक सफल हुआ इसे तो आपकी प्रतिक्रिया ही बता पाएगी । इस पोस्ट को अत्यधिक रूचिकर एवं सार्थक बनाने में आपके सहयोग की तहे-दिल से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद सहित- आपका प्रेम सागर सिंह
            
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Sunday, May 27, 2012

आज भी कबीर जनमानस में रचे बसे हैं


आज भी कबीर जनमानस में रचे बसे हैं

    (कबीर)

कबीर की वाणी का अनुकरण नहीं हो सकता। अनुकरण करने की सभी चेष्टाएँ व्यर्थ सिद्ध हुई हैं। इसी व्यक्तित्व के कारण कबीर की उक्तियाँ श्रोता को बलपूर्वक आकृष्ट करती हैं। इसी व्यक्तित्व के आकर्षण को सहृदय समालोचक सम्भाल नहीं पाता और रीझकर कबीर को 'कवि' कहने में संतोष पाता है। “--- हजारी प्रसाद द्विवेदी

          प्रस्तुतकर्ता : प्रेम सागर सिंह (प्रेम सरोवर)


भारत के प्राचीन कवियों में कबीर साहब एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में समाज-सुधार का संदेश सबसे अधिक है। उनके सत्य- लोक- गमन को कोई साढ़े चार सौ साल हो गए, लेकिन आज, भी उनके दोहे और पद पुराने नही लगते ।ऐसा लगता है मानो, उनकी रचना आज की स्थिति को सामने रख कर की गई हो; मानो उनके श्रोता पठानकालीन हिंदुस्तानी नही, बल्कि, वर्तमान काल के हिंदुस्तानी रहे हों। इसका कारण यह है कि कबीर साहब ने मानव समाज के बारे में जो सपना देखा था, वह अभी पूरा नही हुआ, न वह स्वप्न हमारा आँखों से ओझल हो पाया है । कबीर साहब भविष्यद्रष्टा कवि थे और भारतीय समाज की जो कल्पना उन्होंने की थी, वह इतनी मजबूत निकली कि वह आज भी हमारे साथ है और हम उसी कल्पना को आकार देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं ।

हिंदू समाज की सबसे बड़ी त्रुटि उन्हे यह दिखाई पड़ी थी कि इस समाज के लोग विचार के धरातल पर यह तो विश्वास करते हैं कि सारी सृष्टि एक ही व्रह्म से निकली है। इसलिए, सभी मनुष्य परस्पर समान हैं; किंतु आचार के धरातल पर उनका यह विश्वास खंडित हो जाता है, क्योंकि कुछ वर्णों को वे जन्मना श्रेष्ट और बाकी को अधम मानते हैं। कुछ मनुष्यों को स्पर्श के योग्य और कुछ को अक्षूत मानते हैं । हिंदू-समाज के भीतर प्रचलित इस रूढ़ि के खिलाफ कबीर साहब ने जीवन-पर्यंत संघर्ष किया और सारी जिंदगी वे हिंदुओं को समझाते रहे कि जन्म से भी मनुष्य समान हैं, ऊंच-नीच का भेद कर्म उत्पन्न करते हैं। अतएव, जन्म से एक को ब्राह्मण और दूसरे को शूद्र मत समझो, क्योंकि ऐसा विभेद करने का कोई आधार नही है ।

एक बूँद, एकै मल -मूतर, एक चाम, एक गुदा,
एक ज्योति से सब उत्पन्ना, को बाभन, को सूदा!

संतों  की और से जाति प्रथा को चुनौती  बहुत पुराने जमाने े मिलती आ रही है। ऐसे संतों में सबसे बड़ा नाम महात्मा बुद्ध का है ।असल में कबीर, नानक एवं महात्मा गांधी आदि महात्मा उसी धारा के संत हैं जो धारा बुद्ध के कमंडलु से बही थी । किंतु, इतने संघर्षों के बाद भी, जाति-प्रथा कायम है यद्यपि ज्यों-ज्यों समय बीतता है, उसके बंधन ढीले होते जाते हैं । नया हिंदुस्तान सभी रूढियों से मुक्त करने की आज भी संघर्ष कर रहा है और इस संघर्ष में हमें बहुत बड़ी प्रेरणा कबीर साहब से मिलती है ।

नए भारत की सबसे बड़ी समस्या हिंदू-मुस्लिम एकता की है । महात्मा गांधी का पूरा जीवन इस समस्या के सुलझाने का प्रयास था और, अंत में, इसी समस्या के सुलझाने की कोशिश में उन्होंने वीर गति भी पाई । इसी समस्या ने कबीर साहब को उतना ही बेचैन रखा था जितना उसने गांधी जी को रखा। अंतर यह है कि गांधी जी के मुंह से  कभी कोई ऐसी बात नही निकली जिससे हिंदुओं तथा मुसलमानों के दिल पर कोई धार्मिक चोट पहुंचे । लेकिन कबीर साहब के समय राजनीति का भय नही था। हिंदुत्व और इस्लाम के बीच का भेद मिटाने के लिए उन्होंने दोनों ही धर्मों की इतनी कटु आलोचना की थी कि दोनों ही धर्मों के नेता तिलमिला उठे । नतीजा यह हुआ कि कबीर साहब पर कठिनाईयां बरस पड़ी और उनके शत्रु दोनों ही गिरोहों में पैदा हो गए ।

अपनी निडर भाषा के कारण उनके विचार अंगारों की तरह  समाज की छाती में धड़कने लगे, उसी प्रकार वे पिछले करीब साढ़े चार सौ साल से दहकते चले आ रहे हैं ।कबीर साहब बार- बार मनुष्यों को एक परमात्मा का ध्यान दिलाते हैं और बार- बार कहते हैं कि इस एक को पाने के लिए अनेक पंथ क्यों बनाते हो और अगर पंथ एक बना भी लिए तो उन्हे लेकर परस्पर झगड़ते क्यों हो ! इस पर वे कहते हैं:-

जो खोदाय मसजीद बसतु हैं, और मुलुक कहीं केरा!
तीरथ-मूरत रामनिवासी, बाहर केहिका डेरा !
x         x          x          x             x               x

युग के अनुसार हमारी भाषा बदल गई है लेकिन, आज, भाव एक ही है ।कबीर ने ज्ञान से शास्त्र का अर्थ लिया था। आज का शास्त्र- ज्ञान विज्ञान है और अपने समय में ज्ञान के लेकर कबीर को जो चिंता थी, विज्ञान को लेकर वही चिंता आज के युग में देखी जा सकती है । पंडित और मूर्ख में से मूर्ख का पक्ष लेते हुए इकबाल ने लिखा है :--

तेरी बेइल्मी ने रख ली बेइल्मों की शान,
आलिम- फाजिल बेच रहे हैं अपना दीन-ईमान


नोट:- अपने किसी भी पोस्ट की पृष्ठभूमि में मेरा यह प्रयास रहता है कि इस मंच से सूचनापरक साहित्य को आप सबके समक्ष प्रस्तुत करता रहूं किंतु मैं अपने प्रयासों में कहां तक सफल हुआ इसे तो आपकी प्रतिक्रिया ही बता पाएगी । इस पोस्ट को अत्यधिक रूचिकर एवं सार्थक बनाने में आपके सहयोग की तहे-दिल से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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Monday, May 21, 2012

खड़ी बोली हिंदी और ऊर्दू के पिता : अमीर खुसरो


 खड़ी बोली हिंदी और ऊर्दू के पिता : अमीर खुसरो



         (अमीर खुसरो)


प्रस्तुतकर्ता : प्रेम सागर सिंह (प्रेम सरोवर)

अमीर खुसरो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अफगानी पिता एवं भारतीय माता के पुत्र खुरो एक सूफी कवि के रूप में जाने जाते हैं। भारतीय संगीत के विकास और खास कर भारत में सूफी संगीत के विकास में उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। कहा जाता है कि तबले का अविष्‍कार उन्‍होंने ही किया था।  सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्‍य खुरो को गंगा जमुनी संस्कृति के एक बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। 1253 ई. में उत्‍तर प्रदेश के एटा जिले में जन्‍में खुरो फारसी और हिंदी में समान रूप से दखल रखते थे। उनकी वे कविताएं तो लाजवाब हैं जिनमें उन्‍होंने एक छंद फारसी का रखा है तो दूसरा हिंदी का।

अमीर खुसरो के बारे में कुछ जानकारी देने के पूर्व मैं समझता हूं कि उनके पूर्व की परिस्थितियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत करना बहुत ही आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए तदयुगीन हालातों के बारे में इस सत्य से परिचित करवाना चाहता हूं कि पठान सुल्तान उल्माओं के मार्ग-दर्शन पर चलते थे और उलमाओं का उपदेश यह था कि जो सुल्तान अधिक-से-अधिक काफिरों को मुसलमान बनाएगा,अधिक-सेअधिक मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ेगा, वही सबसे बड़ा सुल्तान है। अतएव मुसलमानों के लिए यह जरूरी हो गया कि उलमाओं की इच्छा पूर्ति के लिए वे हिंदू धर्म पर अत्याचार करें । लेकिन मुसलमानों के सूफी संत उलमाओं के साथ नही थे।वे धर्मों के बाहरी रूप को महत्व नही देते थे । उनका सारा जोर धर्मों की एकता पर था और यही भाव इस्लाम के प्रति हिंदू-साधकों और संतों का भी था ।

उस समय इस्लाम के भीतर से एकता की आवाज बहुत जल्द उठने लगी । राजा पृथ्वीराज का निधन 1192 ई. में हुआ और उसके 61 वर्ष के बाद अमीर खुसरो का जन्म हुआ । अमीर खुसरो भारत के सबसे पहले राष्ट्रीय मुसलमान थे । वे हजरत चिश्ती के शिष्य और स्वयं ऊँचे तबके के सूफी साधक थे। वे खड़ी बोली हिंदी और ऊर्दू-दोनों भाषाओं के पिता थे। जिस भाषा में हम लोग अब अपना साहित्य लिखते हैं, उस भाषा में सबसे पहले-पहल रचना अमीर खुसरो ने आरंभ की थी । अमीर खुसरो का लिखा हुआ एक महाकाव्य है, जिसका नाम नूहे सिफर है। उन्होंने इस काव्य में भारतवर्ष का वर्णन किया है। उनके वर्णन से पता चलता है कि 14 वीं सदी में भी भारत संसार का सबसे अग्रणी देश था ।

खुसरो की दष्टि में भारत इसलिए वंदनीय है कि इस देश में ज्ञान और विविध विधाओं का व्यापक प्रचार है । विश्व की सभी भाषाएं भारतवासी शुद्धता से सीख और बोल सकते हैं । ज्ञान सीखने के लिए बाहर के लोगों को भारत आना पड़ता है, किंतु भारतवासियों को भारत से बाहर जाना नही पड़ता है । अंकों का विकास भारत में हुआ है । विशेषत: शून्य का प्रतीक भारत का आविष्कार है । हिंदसा शब्द हिंद और असा- इन दो शब्दों के योग से बना है। शतरंज के खेल का आविष्कर्ता भारत है । भारतीय संगीत सभी देशों के संगीत से उच्चकोटि का है । संगीत पर यहां केवल मनुष्य ही नही झूमते, उसे सुनकर यहां के हिरणों का भी स्तंभ हो जाता है । अन्य किसी दूसरे देश में खुसरो के समान भाषा का दूसरा जादूगर नही है , गर्चे वह सुल्तान का अदना सा चारण है ।

भारत को खुसरो ने पृथ्वी का स्वर्ग माना है और लिखा है कि आदम और हौवा जब स्वर्ग से निकले थे, तब वे इसी देश में उतरे थे । भारत के सामने खुसरो ने बसरा, तुर्की, रूस चीन, खुरासान, समरकंद, मिश्र और कंधार- सबको तुच्छ बताया है । फिर खुसरो ने यह भी लिखा है कि कोई मुझसे पूछ सकता है कि तू मुसलमान होकर हिंदुस्तान की बड़ाई क्यों करता है । मेरे जवाब यह होगा कि इसलिए कि हिंदुस्तान मेरी जन्म-भूमि है और पैगंबर साहब का हुक्म है कि तुम्हारे जन्म-भूमि का प्रेम तुम्हारे धर्म में शामिल होगा ।
जिन देशों में मुसलमानों का बहुमत नही है, उन देशों के मुसलमान मन से एक कठिनाई का अनुभव करते हैं । आरंभ से ही उन्हे सिखाया गया है कि जिस देश पर मुसलमानों का राज नही है, बह देश दारूल - हरब (शत्रुओं का देश) समझा जाना चाहिए । अत: देश- भक्ति और धर्म- भक्ति को एक साथ ले चलने में मुसलमानों को कठिनाई होती है।आम लोगों का खयाल है कि जिस देश का शासन इस्लामी कानून से नही चलता,उस देश में बसने वाले मुसलमान प्रच्छन्न विद्रोही बनकर जीते हैं।अमीर खुसरो ने यह कहकर कि आदमी का जन्म-भूमि का प्रेम उसके धर्म-प्रेम में शामिल होता है, मुसलमानों के इस अंध - विश्वाश को फाड़ दिया था । यदि खुसरो को हिंदुस्तान ने अपने आदर्श मुसलमान के रूप में उछाला होता, तो हिंदुस्तान की कठिनाई कुछ-न-कुछ कम हो गई होती। आज भी मौका है कि हम खुसरो को आदर्श भारतीय मुसलमान के रूप में जनता के सामने पेश करें ।

अपने किसी भी पोस्ट की पृष्ठभूमि में मेरा यह प्रयास रहता है कि इस मंच से सूचनापरक साहित्य को आप सबके समक्ष प्रस्तुत करता रहूं किंतु मैं अपने प्रयासों में कहां तक सफल हुआ इसे तो आपकी प्रतिक्रिया ही बता पाएगी । इस पोस्ट को और रूचिकर बनाने में आपके सहयोग की तहे- दिल से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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