Thursday, January 24, 2013

बचपन की एक प्रिय कविता

    

  एक बूंद


(अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध)
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?

देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी।
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।



लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता
 है कर ।



(www.premsarowar.blogspot.com)


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8 comments:

  1. (अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध)जी
    की सुन्दर रचना साझा करने के लिए आभार,,,,प्रेमसागर जी ,,,

    recent post: गुलामी का असर,,,

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  2. सुन्दर प्रस्तुति |

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  3. बचपन याद आ गया ...:)

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  4. उम्दा प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई...६४वें गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाएं...

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  5. ये कविता मुझे भी पसंद है.आभार इस प्रस्तुति का.

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  6. अति सुन्दर ,भावपूर्ण रचना ...

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