Saturday, March 3, 2012

राम दरश मिश्र




रामदरश मिश्र
आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा
सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा

आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में
हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा

था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन
हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा

लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे
आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा

क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर
चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा

ख़ून से लथपथ हवाएँ ख़ौफ-सी उड़ती रहीं
आँसुओं से नम मिली वातास तो अच्छा लगा

है नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान है
है जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगा

हँसी हँसते हाट की इन मरमरी महलों के बीच
हँस रहा घर-सा कोई आवास तो अच्छा लगा

रात कितनी भी धनी हो सुबह आयेगी ज़रूर
लौट आया आपका विश्वास तो अच्छा लगा

आ गया हूँ बाद मुद्दत के शहर से गाँव में
आज देखा चँदनी का हास तो अच्छा लगा

दोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदा
आज दुश्मन ने कहाशाबाश तो अच्छा लगा
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10 comments:

  1. बहुत सुंदर!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    होलिकोत्सव की शुभकामनाएँ!

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  3. रात सोये तो संशय यही, कहीं कल हो न हो,
    आँख खुली और चलने लगी साँस तो अच्छा लगा।

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  4. बहुत सुन्दर...
    ये मेरी पसंदीदा रचनाओं में से एक है...

    शुक्रिया.

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  5. दोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदा
    आज दुश्मन ने कहा-शाबाश तो अच्छा लगा ।

    बहुत सुंदर रचना।
    मन तृप्त हुआ मिश्र जी को पढ़कर।
    होली की शुभकामनाएं।

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  6. बहुत बहुत अच्छी कविता..आभार

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  7. है नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान है
    है जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगा ...

    behatreen gazal padhwaane le liye aapka abhaar prem sarovar jee...

    regards.

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  8. बहुत बढ़िया भाव अभिव्यक्ति की बेहतरीन रचना लगी श्री रामदरस जी की पढवाने के लिए
    ...आभार
    फालोवर बन गया हूँ आप भी बने खुशी होगी,और संग आने जाने का बना रहेगा,...

    NEW POST...फिर से आई होली...
    NEW POST फुहार...डिस्को रंग...

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  9. बहुत बहुत अच्छी कविता| होली की शुभकामनाएं।

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