Monday, March 26, 2012

लेकिन मेरा लावारिस दिल


लेकिन मेरा लावारिस दिल

:

(डॉ. राही मासूम रजा)

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी 
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब 
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला 
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बंदा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आँसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
जगह जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी 
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।


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12 comments:

  1. शुभकामनायें |

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  2. बहुत अच्छे इंसान थे डा० साहब.

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  3. बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन प्रस्तुति

    MY RESENT POST...काव्यान्जलि... तुम्हारा चेहरा.

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  4. बहुत सुंदर रचना....आभार !!

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  5. आग और खून के इस दलदल में
    मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।SAHI BAT.....

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  6. रचना पढ़वाने का आभार..

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  7. बहुत ही बढ़िया रचना:-)

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  8. रचना पढ़वाने का आभार..

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  9. सार्थक, सुन्दर सृजन, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम प्रविष्टि पर भी पधारें.

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  10. बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन भाव अभिव्यक्ति, रचना पढ़वाने का आभार.. " सवाई सिंह "

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  11. बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
    ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
    आख़िर किसके नाम का निकला
    मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
    मंदिर राम का निकला
    बंदा किसके काम का निकला


    आदरणीय प्रेम सागर सिंह जी
    सस्नेहाभिवादन !

    ऐसी रचनाओं पर क्या कहा जाए …
    आभार आपका !

    *दुर्गा अष्टमी* और *राम नवमी*
    सहित
    ~*~नवरात्रि और नव संवत्सर की बधाइयां शुभकामनाएं !~*~
    शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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