Thursday, October 2, 2014

राही मासूम रजा

लेकिन मेरा लावारिस दिल

राही मासूम रजा

हिन्दी - उर्दू साहित्य के सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ राही मासूम रजा  का जन्म 1 सितम्बर 1927 ,को गाजीपुर (उत्तर प्रदेश ) के गंगोली गाँव में हुआ था। राही की प्रारंभिक शिक्षा गाजीपुर शहर में हुई।  इंटरकरने के बाद ये अलीगढ आ गए और यही से इन्होने उर्दू साहित्य में एम .ए.करने के बाद " तिलिस्म- -होशरुबा " पर पी.एच .डी.की डिग्री प्राप्त की । "तिलिस्म -ए -होशरुबा" उन कहानियो  का संग्रह है जिन्हें घर की नानी-दादी ,छोटे बच्चो को सुनाती है । पी .एच.डी करने के बाद ,ये  विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य के अध्यापक हो गए । अलीगढ में रहते हुए इन्होने अपने प्रसिद्ध उपन्यास " आधा-गाँव "की रचना की ,जोकि भारतीय साहित्य के इतिहास का एक मील का पत्थर साबित हुई। उन्हें रोज़गार के लिए फ़िल्म लेखन का काम शुरू किया। इसके लिए इन्हे कई बार बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा । लेकिन इन्होने बड़ी सफलतापूर्बक सबका निर्वाह किया फ़िल्म लेखन के साथ-साथ ये साहित्य रचना भी करते रहे । इन्होने जीवन को बड़े नजदीक से देखा और उसे साहित्य का विषय बनाया। इनके पात्र साधारण जीवन के होते और जीवन की समस्यों से जूझते हुए बड़ी जीवटता का परिचय देते है । इन्होने हिंदू -मुस्लिम संबंधो और बम्बई के फिल्मी जीवन को अपने साहित्य का विषय बनाया। इनके लिए भारतीयता आदमियत का पर्याय थी । इन्होने उर्दू साहित्य को देवनागरी लिपि में लिखने की शुरुआत की और जीवन पर्यंत इसी तरह साहित्य के सेवा करते रहे और इस तरह वे आम-आदमी के अपने सिपाही बने रहे । इस कलम के सिपाही का देहांत 15मार्च 1972 को हुआ। आईए, डालते हैं एक नजर उनकी एक कविता लेकिन मेरा लावारिस दिल   पर जो उनके विचारों को एक नया आयाम देती हैं ।


लेकिन मेरा लावारिस दिल  
:
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी 
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब 
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला 
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बंदा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आँसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
जगह जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी 
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
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Sunday, September 21, 2014

एहसास की चुभन

एहसास की चुभन
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तुम्हारा  साथ भी 
गुलाबों की तरह 
किताबों में दबाया 
जा सकता तो कितना 
अच्छा होता ......
हल्का-हल्का 
महकता 
कभी कभी कुछ कहता 
थोडा थोडा सा चुभता
तुम बंध जाती इन 
किताबों की सलवटों में 
और मैं तुम्हें 
हाथों से महसूस करता 
छूता.....चूमता और 
सीने लगा कर सो जाता
बहुत सुकूं भरी रातें होती 
वो सच .....
मोहब्बत 
पढ़ती और 
मोहब्बत कहते हुए 
किताब के उस मोड़ संग 
अपना जीवन गुजार देता
कितना 
प्रेम होता हमारे 
जहां में 
न तुम्हें मुझसे 
दूर जाने का डर होता 
न मुझे तुम्हारी 
जुदाई का गम

तुम और मैं 
गुलाब से रहते 
सदा जवां-जवां 
अपने प्यार की यादों में ........

Sunday, August 24, 2014

खामोश भावनाओं की ऊपज

खामोश भावनाओं की ऊपज
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(प्रेम सागर सिंह)

संभावनाओ की प्रत्याशा में,
जब ऊम्मीद की किरण
अपनी रश्मि बिखेरती है
और जब
फैला देती है समूचे परिवेश में
अपनी आभा की प्रतिच्छाया
जिसकी मद्धिम सी रोशनी में
दिख जाता है तुम्हारा
वह सजीला एवं सलोना सा रूप,
जो कभी मेरे अंतस को
न चाहते हुए भी
झकझोर देता था।

वक्त के साथ चलते-चलते
जब पुरानी बातें कभी-कभी
दिल के कोने से निकल कर
आँखों के सामने दिखती हैं
तब मन का कुछ असहज सा
हो जाना, क्या स्वभाविक नही है!
यदि स्वीकार भी कर लूं तो
ये बावरा मन न जाने क्यूं
मजबूर कर देता है सोचने के लिए।
बीते दिनों के संघर्ष को,
राग और विराग को,
जीत, हार और तारीफ को।

इन हालातों के दायरे में
विगत स्मृतियों का दुहराव
सिर्फ आहत भावनाओं की ऊपज है,
जो मेरी कोमल संवेदनाएं हैं,
जो न चाहते हुए भी मेरी
बेबश आँखों की कोरों से
फिसल कर धरा पर गिर

अपना वजूद खो देती है। 

Thursday, July 10, 2014

अंतस की पीड़ा


अंतस की पीड़ा

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      (प्रेम सागर सिंह)

" अनजाने ही मन न जाने क्यूं अतीत मेंं फिसल जाता है,
 फिर अचानक वर्तमान में संगी बनकर मन को बहला जाता है।
जाने क्यो हसना मुझे अब गुनाह सा नजर आता है,
नदी की चादर पर नाचता हर बिँदू खोखला सा इठलाता है।
साँझ के धुँधलके में हवा का कोई झोंका मदमाता है,
तो मेरे अँतर मे बहुत कुछ हल्का सा दरक जाता है।
हर दरार को हर बार मै कागज़ से ढाँक लेता हूँ,
दे देता हूँ उस दरार को  सीवन,  विकल्पो की
पर यादो का परीँदा केवल
एक फड़फड़ाहट मेँ ही
मेरा सारा सीवन उधेड़ जाता है।
इसी मशक्कत मे घड़ी पहर बीत जाता है
और मेरे हाथ कुछ भी नही आता है।"
खाली हथेलियो से मुँह ढ़ाँपे
समय मौज मनाता है

और
मेरे अँतस का पतझर अशेष रीता जाता है 

अशेष रीता जाता है  ...अशेष रीता जाता है।"

Saturday, April 5, 2014

मन का उच्छवास


      स्मृतियों की गवाही में    

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 (प्रेम सागर सिंह)

यहां हर  दिन हर पल मैं
गुनाह होते देख रहा हूं।
मजबूरी यह है मेरे दोस्तों,
कि 
इस घटना की गवाही देना,
मेरे लिए मुमकिन नहीं।
फिर भी इसे मन में सहेज रखता हूं,
ऐसा न हो कि शायद किसी दिन,
मुझे गवाह के रूप में,
कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।

जाने कब जमाने की हरकतें,
तकदीर की लकीरों पर कुछ लिख कर,
मेरे सिद्धांतों को बहका जाए,
मेरे सही कदमो को गलत दिशा ना मिले, 
इसलिए संभल कर चलना,
मेरी आदत सी बन गई है !
अब तो राहों में मूक मुसाफिर बनकर,
अपने छोड़े पदचिन्हों पर चलते जाना ही,
मेरी नियत सी बन गई है।

चलते-चलते कितने शब्द कहाँ लिख डाले,
स्मृति-मंजूषा में कुछ तो संचित रहे,
पर कुछेक को जमाने की चाहत को,
देखते हुए भूल जाने पर मजबूर हुआ।
जो याद रहा वो पास रहा,
जो भूल गया सो भूल गया,
पर कुछ को सहेज यहाँ तक लाया,
जिसने मन को काफी बहलाया।

दिन के उजियारे में,
जब आकाश उतर आता है,
मन न जाने क्यूं धूप के दूर कोने में,
खुशियों का दामन पकड़ कर,
अतीत में खोने लगता है।

स्मृतियों की गवाही में,
अजनबी सायों के चेहरे,
अब मायूस से कर जाते हैं
अब डर सा लगता है, कहीं,
इनमें से कोई मेरा हमसफर,
न मिल जाए।

यादों के अतल में,
कई चेहरे गुम से हो जाते हैं
कुछ तो याद रहते हैं,
और कुछ विस्मृत से हो जाते हैं,
खामोश मन में भूली बिसरी,
यादों का ऊभर आना,
अब इस ढलती वय में,
कुछ परेशान सा कर जाता है,
कुछ भाव मन को दोलायमान करते है,
तो कुछ सितारों- जड़ित करके,
मन में सहसा फिसल जाते हैं।
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