Saturday, April 5, 2014

मन का उच्छवास


      स्मृतियों की गवाही में    

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 (प्रेम सागर सिंह)

यहां हर  दिन हर पल मैं
गुनाह होते देख रहा हूं।
मजबूरी यह है मेरे दोस्तों,
कि 
इस घटना की गवाही देना,
मेरे लिए मुमकिन नहीं।
फिर भी इसे मन में सहेज रखता हूं,
ऐसा न हो कि शायद किसी दिन,
मुझे गवाह के रूप में,
कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।

जाने कब जमाने की हरकतें,
तकदीर की लकीरों पर कुछ लिख कर,
मेरे सिद्धांतों को बहका जाए,
मेरे सही कदमो को गलत दिशा ना मिले, 
इसलिए संभल कर चलना,
मेरी आदत सी बन गई है !
अब तो राहों में मूक मुसाफिर बनकर,
अपने छोड़े पदचिन्हों पर चलते जाना ही,
मेरी नियत सी बन गई है।

चलते-चलते कितने शब्द कहाँ लिख डाले,
स्मृति-मंजूषा में कुछ तो संचित रहे,
पर कुछेक को जमाने की चाहत को,
देखते हुए भूल जाने पर मजबूर हुआ।
जो याद रहा वो पास रहा,
जो भूल गया सो भूल गया,
पर कुछ को सहेज यहाँ तक लाया,
जिसने मन को काफी बहलाया।

दिन के उजियारे में,
जब आकाश उतर आता है,
मन न जाने क्यूं धूप के दूर कोने में,
खुशियों का दामन पकड़ कर,
अतीत में खोने लगता है।

स्मृतियों की गवाही में,
अजनबी सायों के चेहरे,
अब मायूस से कर जाते हैं
अब डर सा लगता है, कहीं,
इनमें से कोई मेरा हमसफर,
न मिल जाए।

यादों के अतल में,
कई चेहरे गुम से हो जाते हैं
कुछ तो याद रहते हैं,
और कुछ विस्मृत से हो जाते हैं,
खामोश मन में भूली बिसरी,
यादों का ऊभर आना,
अब इस ढलती वय में,
कुछ परेशान सा कर जाता है,
कुछ भाव मन को दोलायमान करते है,
तो कुछ सितारों- जड़ित करके,
मन में सहसा फिसल जाते हैं।
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21 comments:

  1. फिर भी इसे मन में सहेज रखता हूं,
    ऐसा न हो कि शायद किसी दिन,
    मुझे गवाह के रूप में,
    कठघरे में खड़ा कर दिया जाए।
    बहुत प्रभावशाली पंक्तियाँ...

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  2. स्मृतियों की गवाही में,
    अजनबी सायों के चेहरे,
    अब मायूस से कर जाते हैं
    अब डर सा लगता है, कहीं,
    इनमें से कोई मेरा हमसफर,
    न मिल जाए।
    बहुत भावपूर्ण पंक्तियाँ |उम्दा रचना|
    आशा

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  3. क्या बात है। लाजवाब रचना।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (06-04-2014) को "खामोशियों की सतह पर" (चर्चा मंच-1574) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चैत्र नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
    परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. स्मृतियों की गवाही में,
    अजनबी सायों के चेहरे,
    अब मायूस से कर जाते हैं
    अब डर सा लगता है, कहीं,
    इनमें से कोई मेरा हमसफर,
    न मिल जाए।
    ...बहुत खूब...बहुत भावपूर्ण रचना...

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  6. जो राह चुनी तूने उसी राह पे रही चलते जाना रे...सुंदर रचना...

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  7. सुन्दर रचना

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  8. दिल को छूती हुई रचना..बहुत सुंदर..

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  9. अत्यन्त प्रभावी शब्द रचना।

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  10. बहुत सुंदर रचना प्रेम जी ..... कृपया मेरे ब्लॉक अभिव्यंजना पर आकर उत्साह वर्धन करें ..... आपका आभार होगा ....

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  11. वाह... उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@भजन-जय जय जय हे दुर्गे देवी

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  12. सामाजिक विसंगतियों पर सुन्दर कटाक्ष । हम सभी इन स्थितियों से गुज़र रहें हैं ।

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  13. emotion hai tabhi ham kavi hain sundar abhiwayakti ......

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  14. बहुत भावपूर्ण निरूपण !

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  15. उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)

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  16. धन्यवाद, चतुर्वेदी जी।

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  17. धन्यवाद मित्रगण, शुभ रात्रि।

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